धनबाद(DHANBAD): कोयलांचल की मिट्टी की खासियत कही जाती है कि यह किसी भी एक "व्यवस्था" को बहुत दिनों तक स्वीकार नहीं करती। चाहे माफिया राज की बात हो, दबंगई की बात हो, गुंडागर्दी की बात हो अथवा नेतागिरी की बात हो. 1960 के बाद कोयलांचल में रंगदारी के रंग बदलते रहे. पात्र भी बदलते रहे, कोई बंदूक की गोलियों से मारा गया तो कई स्वाभाविक मौत भी मरे. लेकिन उसके बाद भी माफियागिरी का दौर चलता रहा. बुजुर्ग बताते हैं कि अब कोलियरियों पर एक तरह से कब्जा कर रंगदारी वसूलने के बाद रंगदारी का एक नया तरीका डेवलप हो गया था. कोलियारियों पर कब्जा कर रंगदारी वसूली का काम ढीला पड़ गया था. इस वजह से रंगदारी का एक नया तरीका ढूंढ लिया गया था.
रोड सेल ढीला पड़ा तो रैक ढुलाई में होने लगी मारामारी
यह अलग बात है कि इस समय तक माफिया के "यूथ विंग " इसमें शामिल हो गए थे. "यूथ विंग" को भी कोयले के धंधे पर कब्जे की जल्दीबाजी थी. उस समय रोड सेल से कोयले की ट्रांसपोर्टिंग कम होने लगी थी. झरिया के कतरास मोड़ में सुबह की रौनक भी मद्धिम पड़ने लगी थी. एक समय था, जब किरण फूटते ही झरिया के कतरास मोड़ में करोड़ों -करोड़ों का कारोबार हो जाता था. डीओ होल्डर पुर्जी निर्गत करते थे और उसके बाद कोलियारियों से कोयले का उठाव होता था. रोड सेल जब कम हुआ तो रेलवे रैक से कोयले की ढुलाई बढ़ गई थी. उसके बाद इसी रैक से कोयले की ढुलाई को हथियार बनाया गया और शुरू हो गया नया खेल.
कैसे माफिया के "यूथ विंग" कोयले के लिफ्टर बन गए
माफिया के "यूथ विंग" कोयला उठाने वाली बड़ी-बड़ी पार्टियों के लिफ्टर बन गए और मिली जानकारी के अनुसार प्रति रैक ₹50,000 से लेकर 90,000 तक की वसूली करने लगे. इस क्रम में कोयला उठाने वाली पार्टियों को नुकसान नहीं हो, इसका ख्याल रखा जाने लगा. उच्च गुणवत्ता का कोयला डीओ से अधिक मात्रा में भेजा जाने लगा. कोयला उठाने वाली पार्टियों को भी सहूलियत होती थी. बिना किसी विवाद के कोयला उनके डेस्टिनेशन तक पहुंच जाता था. यह काम बहुत दिनों तक शांतिपूर्वक चला. उसे समय तक कोयला के कारोबार में सुरेश सिंह मजबूत हो गए थे.
कैसे कोयलांचल का कोयला नए दौर को जन्म दिया
बहुत दिनों तक यह कारोबार शांतिपूर्वक चलता रहा. लेकिन बाद में इस पर औरों की नजर पड़ी और तकरार शुरू हुआ. इसी क्रम में बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश के बाहुबलियों की नजर कोयलांचल पर पड़ चुकी थी और वह भी कोयला उठाव में इंटरेस्ट लेने लगे थे. फिर तो तकरार भी शुरू हुआ. कोयलांचल से लेकर उत्तर प्रदेश तक कई हत्याएं हुईं। कहा जाता है कि सूर्यदेव सिंह जब तक जीवित रहे, बाहर के बाहुबलियों की कोयलांचल की ओर झांकने की हिम्मत नहीं हुई थी. लेकिन उनके निधन के बाद कोयला उठाव की व्यवस्था भी बदली और बाहुबलियों का कोयलांचल में प्रवेश भी हुआ. उसके बाद कोयलांचल का कोयला नए दौर को जन्म दिया।

