लोकसभा चुनाव के बाद धनबाद के कोयला मजदूर संगठनों के हाथ लग सकता है बड़ा मुद्दा ,जानिए इसका डिटेल्स

    लोकसभा चुनाव के बाद धनबाद के कोयला मजदूर संगठनों के हाथ लग सकता है बड़ा मुद्दा ,जानिए इसका डिटेल्स

    धनबाद(DHANBAD) | लोकसभा चुनाव के बाद धनबाद के कोयला  मजदूर संगठन के  नेताओं के हाथ एक मुद्दा लग सकता है.  इसकी संभावना अधिक दिख रही है.  कोल इंडिया की अनुषंगी  कंपनी भारत कोकिंग कोल्  लिमिटेड का 25% विनिवेश किया जा सकता है.  लिस्टिंग को लेकर अभी हाल ही में एक बैठक में   इसकी चर्चा हुई.  विनिवेश की आवाज़  तेज होगी तो मजदूर संगठनों की भी सक्रियता बढ़ेगी.  मजदूर संगठन कतई नहीं चाहेंगे कि कंपनी में विनिवेश हो.  सूत्रों के अनुसार बीसीसीएल को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया पर काम शुरू कर दिया गया है.  हालांकि बीसीसीएल की लिस्टिंग की योजना कोई नई नहीं  है.  2022 में कोकिंग  कोल्  का सबसे अधिक उत्पादन करने वाली बीसीसीएल और कोयला कंपनियों के लिए माइनिंग , प्लानिंग और डिजाइनिंग से जुड़ी सीएमपीडीआईएल की  लिस्टिंग की योजना बनी थी.  उस समय यह मामला आगे नहीं बढ़ पाया, लेकिन अब इसके संकेत मिल रहे है. 

    पिछले साल कोल इंडिया की आम बैठक में भी संकेत मिले थे 

     पिछले साल कोल इंडिया की आम बैठक में शेयर धारकों के सवाल पर कोल इंडिया लिमिटेड के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक ने कहा था कि बीसीसीएल की लिस्टिंग की योजना है.  इसके लिए कमेटी का गठन किया गया है.  कोकिंग कोल्  की वजह से बीसीसीएल कोल इंडिया की अन्य अनुषंगी  कंपनियों से ज्यादा महत्व रखती है.  हाल के वर्षों में लगातार कंपनी मुनाफे में है.  2022-23 में कंपनी मुनाफे में रही.  2023- 24 में भी मुनाफा बढ़ने के आसार है.  लिस्टिंग होने पर बीसीसीएल की जवाब देही भी बढ़ेगी, साथ ही निर्णय लेने की भी स्वतंत्रता होगी.  बीसीसीएल ने अपनी परित्यक्त खदानों से कोकिंग कोल्   निकालने के लिए निजी कंपनियों को आमंत्रित किया है.  कुछ निजी कंपनियों को बंद कोकिंग कोल्  खदानों को खनन के लिए आवंटित भी किया गया है. वाशरियो  की क्षमता बढ़ाने के लिए भी कंपनी काम  कर रही है.  विनिवेश की चर्चा और जमीनी हकीकत जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे , मजदूर संगठनों में इसका रिएक्शन भी होगा. 

     1971 और 1973 में कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ था.

     1971 और 1973 में कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ था.   उस समय जो मैनपॉवर थे, वह आज नहीं है.  ऐसे भी बीसीसीएल का कोयला उत्पादन आउटसोर्सिंग कंपनियों के भरोसे चल रहा है.  कहा तो यह भी जाता है कि 80% से अधिक कोयले का उत्पादन आउटसोर्सिंग कंपनियां करती है.  यह अलग बात है कि आउटसोर्सिंग कंपनियों के आने से कोयलांचल  में रंगदारी का स्वरूप बदल गया है.  पहले कोलियारियों पर कब्जा की लड़ाई होती थी.  माफिया एक दूसरे का कत्ल करते थे.  अब आउटसोर्सिंग कंपनियों पर मजदूरों की आड़ में कब्जे की लड़ाई चलती है.  जो भी हो लेकिन चुनाव के बाद लगता है कि मजदूर संगठनों को विनिवेश एक मुद्दा मिल जाएगा.  हालांकि मजदूर संगठनों के विरोध का कितना असर पड़ेगा, यह  कहना संभव नहीं है. अभी भी   बीसीसीएल खुद से कोयला  उत्पादन करने के बजाय आउटसोर्सिंग कंपनियों पर अधिक भरोसा करती है. 

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 


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