नन्हे-मुन्नों के साथ सड़क पर उतरा सहायक पुलिस कर्मी का परिवार, कब सुध लेगी सरकार!

    नन्हे-मुन्नों के साथ सड़क पर उतरा सहायक पुलिस कर्मी का परिवार, कब सुध लेगी सरकार!

    चतरा/दुमका(CHATRA/DUMKA) : अपनी मांगों को लेकर रांची के मोरहाबादी मैदान में झारखंड सहायक पुलिस एक महीने से आंदोलनरत हैं. सरकार है कि उनकी सुध नहीं ले रही है. इससे  सिर्फ सहायक पुलिस वाले ही नहीं नाराज हैं, बल्कि उनके परिवार वाले भी सरकार से अपनी नाराजगी जाहिर करने लगे हैं. अब उनके परिजनों का धैर्य जवाब दे रहा है. यही वजह है कि दुमका जिला मुख्यालय में जिले के सहायक पुलिसकर्मी के परिजन सड़कों पर उतर आए हैं. सहायक पुलिस के परिजन छोटे-छोटे बच्चों के साथ काफी संख्या में शहर के टीन बाजार चौक पर एकत्रित हुए, जहां से ढोल-नगाड़े की थाप पर रैली की शक्ल में सभी समाहरणालय परिसर पहुंचे. परिजन सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते नजर आए. समाहरणालय पहुंचकर डीसी को सभी के द्वारा ज्ञापन सौंपा गया. इस बाबत सुनीता हेंब्रम का कहना है कि उनके पति एक महीने से रांची में आंदोलनरत हैं. सरकार उनकी मांगों को सुन नहीं रही है. घर में लोग दाने-दाने को मोहताज हैं. यही वजह है कि परिवार के सभी सदस्य सड़कों पर उतर कर उनके समर्थन में आवाज बुलंद कर रहे हैं. वहीं सूरजमुनि सोरेन का कहना है कि हम अपने हक और अधिकार की मांग कर रहे हैं. हमारी बातों को कोई सुन नहीं रहा है.

    चतरा में भी परिवार वालों ने दिया धरना

    सहायक पुलिसवाले के परिवार का यह आंदोलन अब सिर्फ दुमका तक ही सीमित नहीं है. चतरा जिले में भी सहायक पुलिस के परिवार वालों ने आंदोलन शुरू कर दिया है. सहायक पुलिस कर्मियों के बूढ़े और असहाय माता-पिता भी अब अपने बच्चों के समर्थन में सड़कों पर उतर आए हैं. चतरा समाहरणालय का भी सहायक पुलिस कर्मियों के माता-पिता और असहाय अभिभावकों ने घेराव किया है.  इस दौरान अभिभावकों ने एकदिवसीय धरना भी दिया. धरना के माध्यम से बूढ़े माता-पिता ने राज्य की हेमंत सरकार पर शिक्षित बच्चों का शोषण करने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार उनके बच्चों की जान से खिलवाड़ कर रही है. उन्होंने कहा कि पूर्व की सरकार ने हमारे बच्चों को शिक्षा के आधार पर रोजगार से जोड़ते हुए उनकी सहायक पुलिस के पद पर नियुक्ति की थी लेकिन खुद को गरीबों की सरकार कहने वाली हेमंत ने उन्हें आज नौकरी हटाकर किसी हाल में नहीं छोड़ा है, ना वे दूसरी नौकरी के लायक रहे हैं और ना ही बेरोजगार होकर घर में बैठ सकते हैं क्योंकि नक्सल प्रभावित गांवों से निकलकर पुलिस की नौकरी करने वाले बच्चे आज नक्सलियों के दुश्मन बन चुके हैं.

    रिपोर्ट: पंचम झा, दुमका/ संतोष कुमार, चतरा

     


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