दूसरों का घर रोशन, खुद का अंधेरा... जानिए क्या है कुम्हारों का दर्द

    दूसरों का घर रोशन, खुद का अंधेरा... जानिए क्या है कुम्हारों का दर्द

    धनबाद (DHANBAD) - दीया बनाकर उजाला फ़ैलाने वालों का घर ही अंधेरे में डूब रहा है. महंगाई की मार ने ऐसी कमर तोड़ी है कि अब भीख मांगने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिख रहा. कुम्हारों के परिवार में बाप, बेटे, पत्नी सब दिन-रात काम में लगे रहते हैंं, फिर भी उनका पेट नहीं भरता. पेट भरता है तो कपड़े नहीं, अगर कपड़े खरीदते हैं, तो खाने पर आफत आ जाती है. एक स्थानीय कुम्हार की माने तो 97 की उम्र होने के बाद भी वे लगातार मिट्टी के सामान बनाने में जुटे रहते हैं. इसके बावजूद उनके परिवार को दो जून का भोजन नसीब नहीं हो पाता. पहले जहां मिट्टी के सामान बनाने के लिए अगल बगल में मिट्टी मिल जाती थी, अब वही मिट्टी उन्हें खरीदनी पड़ती है. ऐसे में दाम भी मिट्टी की गुणवत्ता पर निर्भर करता है. अगर तिलाटांड़ से बढ़िया मिट्टी मंगाते हैं, तो एक ट्रेक्टर का 2500 तक लग जाता है. कंकड़ वाली मिट्टी लेने पर 1200 से 1500 लगते  हैं.

     पुनिया देवी की सुनिए

    वहीं की पुनिया देवी कहती हैं कि दिवाली के सीजन में तो ये लोग मिट्टी के दीए बनाकर कुछ कमा लेते हैं. वहीं दिवाली बीत जाने के बाद इनकी हालत फिर पहले जैसी हो जाती है. जहां न इनके पास पूंजी बचती हैं और न ही इनके सामान के खरीदार मिलते हैं. यही कारण है कि इन्हें कुम्भारी का पेशा छोड़ दूसरेकामों में जुटना पड़ता है.

    वोकल फॉर लोकल नारे का कोई असर नहीं

    अगर अकड़ा पर भरोसा करें तो केवल धनबाद शहर में 250 से अधिक परिवार है, जिनका आज भी मुख्य पेशा मिट्टी का सामान बनाना और बेचना है. दिवाली में कुछ ही दिन बाकी है, लेकिन कुम्हारों के चेहरे पर मायूसी है. पहले जहां कुम्हार दिवाली को लेकर विशेष तैयारी करते थे, अब वे मायूस बैटे नज़र आ रहें है. एक तो पूंजी का संकट, दूसरी ओर तैयार माल का बाजार नहीं होने से परेशानी. कुम्हार अगर कर्ज लेकर पूंजी जुटा भी ले तो मुनाफे की कौन कहे, पूंजी बचेगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है. प्रधानमंत्री वोकल फॉर लोकल के नारे का प्रचार प्रसार करते तो है, लेकिन इसका कोई असर कुम्हारों की जिंदगी पर नहीं पड़ता. सच पूछा जाए तो सबकुछ के बावजूद इनके सामने बाजार का बड़ा संकट है. त्यौहारों में तो कुछ बिक्री हो जाती है, लेकिन उसके बाद इनकी आमदनी बंद हो जाती है. मिट्टी के चुकड़ का प्रचलन कम होना भी इनका संकट बढ़ाता है.

    बाजार मिले तो कुछ बने बात

    कुम्हारों का कहना है कि एक तो उनके सामने के लिए बाजार नहीं है, अगर थोड़ा बहुत है भी तो दाम नहीं मिलता. आज भी 50 से 60 रुपये दिए बिकते है. मिटटी के खिलौनों की अब कोई पूछ ही नहीं है. दिवाली में भी नाम मात्र की बिक्री होती है. चायनीज सामानो के बहिष्कार का भी कुम्हारो के धंधे पर कोई असर नहीं हुआ है. अब दीए की जगह बिजली के झालर ने ले लिया है. यहीं हाल रहा तो कुम्हरों की चाक भी इतिहास बन जाएगी.

    रिपोर्ट : अभिषेक कुमार सिंह, ब्यूरो चीफ, धनबाद


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