मिथिलांचल की झिझिया : भाई की लंबी उम्र के लिए सिर पर घड़े को रखकर थिरकीं महिलाएं, जला उम्मीदों का दीप

    मिथिलांचल की झिझिया : भाई की लंबी उम्र के लिए सिर पर घड़े को रखकर थिरकीं महिलाएं, जला उम्मीदों का दीप

    देवघर (DEOGHAR) :  शारदीय नवरात्रि को लेकर जहां बिहार झारखंड में ज्यादातर जगहों पर डांडिया और गरबा रास का आयोजन किया जा रहा है, वहीं देवघर में महिलाओं का एक समूह अपनी संस्कृति का दीप जलाने में प्रयासरत दिखा. देवघर में मिथिला महिला मंच मिथिलांचल के पारंपरिक लोकनृत्य झिझिया के साथ दुर्गा पूजा मना रहा है. बता दें कि पौराणिक काल से दुर्गा पूजा के दौरान किया जाने वाला यह नृत्य अब विलुप्त प्राय है. ऐसे में देवघर में इसका आयोजन एक समृद्ध परंपरा को पुन:स्थापित करने का सराहनीय प्रयास कहा जा सकता है.

    ऊपर-नीचे जलता दीप

    झिझिया मिथिलांचल का एक प्रमुख लोक नृत्य है. शारदीय नवरात्रि के दौरान खास तौर पर किए जा रहे इस लोकनृत्य में महिलाएं गोल घेरा बनाकर नृत्य करती हैं. नाचती महिलाओं के बीच में एक अन्य महिला होती हैं जो मुख्य नर्तकी होती हैं सभी महिलाओं के सिर पर सैंकड़ो छिद्र वाले घड़े होते हैं. घड़े के भीतर दीप जलता रहता है. वहीं घड़े के ऊपर एक ढ़क्कन होता है. इस ढक्कन पर भी एक दीप प्रज्जवलित होता है. तालियों, कदमताल और थिड़कन के साथ होने वाला यह सामूहिक लोकनृत्य एक खूबसूरत समां बांध देता है.

    तांत्रिक विधान

     झिझिया भाई-बहन के प्रेम को दर्शाता है और लोकनृत्य के जरिए बहने भाई की लंबी उम्र और हर बुरी नजर से बचाने के लिए लोकगीत भी गाती हैं. कहा जाता है कि इस नृत्य का तांत्रिक विधान भी है. नृत्य के जरिए घर परिवार की सुख, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है, वहीं बुरी शक्तियों के दूर रखने की मन्नत मांगी जाती है. यूं तो पूरे शारदीय नवरात्रि के दौरान इस लोकनृत्य को गांव की महिलाएं करती हैं, पर अष्टमी की रात इसके आयोजन का खास महत्व है. 

    बहरहाल, यह सच है कि लोकसंगीत-नृत्य को अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए विधिवत शिक्षण की वैसी व्यवस्था नहीं है, जैसी शास्त्रीय संगीत की होती है. ,ऐसे में झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी देवघर में ऐसे आयोजन उम्मीद का दीप जलाते हैं.


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