20 साल के इंतजार के बाद भी भूतपूर्व सैनिक को नहीं मिला जमीन का एक भी टुकडा, अब लौटाएंगे मेडल

    20 साल के इंतजार के बाद भी भूतपूर्व सैनिक को नहीं मिला जमीन का एक भी टुकडा, अब लौटाएंगे मेडल

    चाईबासा(CHAIBASA)-पश्चिमी सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड के सुदूरवर्ती सारंडा के बीहड़ में बसे दीघा के एक आदिवासी सैनिक.  जिनका नाम गोस्सनर टोपनो है. जिसके नाम मात्र से ही सारंडा के लोगों में वीरता की एक ऐसी अनुभूति होती है जो सारंडा में बसे प्रत्येक नौजवानों को देश के प्रति वफादारी और सैनिक बनने के लिए प्रेरित करती है.

    सरकारी बाबुओं के दफतर का चक्कर काटते-काटते स्वर्ग सिधार गए गोस्सनर टोपनो

    बात हो रही है गोस्सनर टोपनो की जिन्होंने 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध में अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपनी जांघ पर गोली खाकर भी युद्ध लड़ते रहे. देश के ऐसे सैनिक जिन्होंने भारत की जमीन का एक टुकड़ा भी पाकिस्तानियों को नहीं दिया. भारत के वीर सैनिकों के सामने पाकिस्तानी सैनिकों ने घुटने टेक दिये. लेकिन बहुत दुःख की बात है कि बिहार से आदिवासियों के उत्थान के नाम पर अलग हुए सन 2000 में झारखंड का निर्माण हुआ. केंद्र और राज्य सरकार की ओर से 5 एकड़ जमीन मिलना था लेकिन पिछले 10 वर्षों से सरकारी बाबुओं के दफ्तरों के चक्कर काटते काटते वीर आदिवासी सैनिक गोसनार टोपनो 18 सितंबर 2014 को स्वर्ग सिधार गए. इतने में भी सरकारी बाबुओं को शर्म नहीं आई और 16 दिसम्बर 2020 को इंतेजार करते करते उनकी विधवा भी चल बसी.

    अब तक नहीं मिला एक टुकड़ा ज़मीन

    उनके पुत्र आलोक अजय टोपनो बताते हैं कि सरकारी कर्मचारियों के द्वारा लगातार 10 वर्षों से सिर्फ आश्वासन ही दिया गया है. जिसमें लगातर यह बताते रहे हैं कि आपकी जमीन बंदोबस्ती मनोहरपुर प्रखंड के बचमगुटु के खाता संख्या 1240, प्लाट संख्या 3666, रकुआ 2.5 डिसमिल थानां संख्या 90, बंदोबस्ती अभिलेख संख्या 1/202/2013 पत्रांक संख्या 524 दिनांक 29/11/12 को निर्धारित किया गया है और 2.5 डिसमिल की प्रक्रिया जारी हैं लेकिन इन घोषणाओं के बावजूद अब तक एक टुकड़ा भी नहीं मिल सका है.

    सरकार को मैडल वापस करने की नौबत

    इन्हीं बातों से क्षुब्ध उनके पुत्र आलोक टोपनो ने कहा कि अगर सरकार सम्मान नहीं दे सकती. ऐसे में वो मैडल का मैं क्या करूंगा. वह सरकार को उनके पिता के बहुदरी के लिए दिए गए चारों मेडल को लौटाने की बात करते है, क्योंकि विगत 10 वर्षों से जमीन के लिए दौड़ दौड़ कर लगभग लाखों रुपए खर्च हो चुका है. अब इस से ज्यादा ना वे दौड़ सकते हैं और ना ही उनके पास खर्च करने लायक पैसे बचे हैं. ऐसे में वे सरकार को मैडल वापस करना ही ठीक समझ रहे हैं. अब झारखंड के हित की बात करने वाली हेमंत सरकार से उनके परिजन चाहते हैं कि देश के लाल आदिवासी सिपाही को उनका हक दिया जाय ताकि सिपाही बनने वाले नौजवनो में एक नई उमीद जग सके. सारंडा जैसे बीहड़ क्षेत्रों के नौजवनों में देश के प्रति प्रेम आस्था और सरकारी वयवस्थाओं पर विस्वास जाग सके. पूरे मामले की सूचना मिलने के बाद जिला डीसी ने मामले की जांच करवाने की बात कही हैं.

    रिपोर्ट:जयकुमार,चाईबासा


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