आदिवासी समाज में बेटी के अधिकार को लेकर विवाद गहराया : सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

    आदिवासी समाज में बेटी के अधिकार को लेकर विवाद  गहराया : सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी

    रांची (RANCHI) :  झारखण्ड हाईकोर्ट के द्वारा आदिवासी बेटियों को सम्पत्ति पर अधिकार दिए जाने के फ़ैसले पर विचार विमर्श करने के लिए विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठन बुधवार को जुटे. समाजसेवी सरन उरांव की अध्यक्षता में नगड़ा टोली स्थित सरना भवन में हुई बैठक में  झारखंड हाईकोर्ट के फैसले का बारीकी से अध्ययन के बाद आगे का कदम उठाने की बात कही गई. 

    क्या है मामला

    झारखंड हाईकोर्ट ने  22 अप्रैल को उरांव जनजाति की बेटियों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कहा कि उन्हें भी बेटों के सामान पैतृक संपत्ति पर हक़ है. प्रार्थी प्रभा मिंज की याचिका पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है.  प्रार्थी प्रभा मिंज ने निचली अदालत में पैतृक संपत्ति में अपनी हिस्सेदारी को लेकर याचिका दायर की थी. लेकिन निचली अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि कस्टमरी लॉ में उरांव जनजाति की बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्से का प्रावधान नहीं है. इसी फैसले पर समाज के लोगों ने बुधवार को विमर्श किया.

    आदिवासी समाज में खरीद बिक्री का साधन नहीं जमीन

    बैठक में पूर्व मंत्री सह आदिवासी महासभा के संयोजक  देवकुमार धान ने कहा कि आदिवासी समाज के कस्टमरी लॉ के अनुसार आदिवासी  महिलाओं को पैतृक सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलता है. चूंकि आदिवासी समुदाय में जमीन को जीविका का एक साधन माना गया है.  इसे खरीद बिक्री करने का साधन नहीं समझा जाता.  बकौल देवकुमार आदिवासी समुदाय में बेटी की शादी हो जाने पर वह स्वत: अपने पति की सम्पति की स्वामी बन जाती है. इसलिए आदिवासी समाज में बेटियों को पैतृक सम्पत्ति में अधिकार नहीं दिया जाता है. कुछ विशेष परिस्थितियों में यदि महिला अविवाहित रहती है या विधवा हो जाती है और वह अपने ससुराल में नहीं रहकर अपने भाई के घर आ जाती है. वैसी स्थिति में उस महिला को जीवनभर जीवनयापन करने हेतु सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार दिया जाता है. परन्तु उस जमीन को वह बेच नहीं सकती है. वह उस जमीन को जीवन भर उपयोग कर सकती है.  देवकुमार धान ने कहा कि आदिवासी संस्कृति और परम्परा पूरे मानव जाति के लिए अनुकरणीय है. पूरे विश्व में आदिवासी संस्कृति ही है जो आज तक सामूहिकता और सहभागिता के सिद्धांत पर चलती है.

    यहां महिलाओं का स्थान ऊंचा

     देवकुमार धान ने कहा कि आदिवासी समुदाय में महिलाओं का बहुत ही ऊंचा स्थान है, और वह जीवन के प्रत्येक पड़ाव में पुरुष के साथ कदम से कदम मिलकर चलती है. ऐसे सुसंस्कृत समाज में बाहरी नियम और कानून थोपना गलत है.  आदिवासी समाज में दहेज़ प्रथा नहीं है. लड़की शादी के लिए वर को चुनती है. ऐसा महान परम्परा किसी अन्य समाज में देखने को नहीं मिलेगी.  धान ने कहा कि हाईकोर्ट के इस फैसले का आदिवासी समाज में बहुत दूरगामी दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे.

    खटखटाएंगे सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा

      धान ने बतलाया कि झारखण्ड हाईकोर्ट के इस फैसले का कानूनी विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन किया जा रहा है. अध्ययन के पश्चात् इस विषय पर उचित कदम उठाया जाएगा. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के परम्परा को बचाने के लिए जरुरत पड़ी तो हाईकोर्ट के डबल बेंच या सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे को उठाया जाएगा. इसके लिए दिनांक 1 मई 2022 को सरना भवन में संविधान विशेषज्ञों की एक बैठक बुलाई गई है.

    ये हुए शरीक

    बैठक में मुख्य रूप से राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा के महासचिव  प्रो. प्रवीण उरांव, आदिवासी महासभा के महासचिव बुधवा उरांव, आदिवासी लोहरा समाज के अध्यक्ष अभय भुटकुंवर, झारखण्ड क्षेत्रीय पड़हा समिति हटिया के अध्यक्ष अजित उरांव, बिनोद उरांव, कजरू उरांव, चारो खलखो, झरिया उरांव, शंकर उरांव, राजेंद्र उरांव समेत अन्य उपस्थित थे.


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