जल, जंगल, जमीन हमारा ..! ग्रामीणों ने राजभवन जाकर कहा जान देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे

    जल, जंगल, जमीन हमारा ..! ग्रामीणों ने राजभवन जाकर कहा जान देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे

    रांची(RANCHI): जान देंगे, जमीन नहीं देंगे. जल, जंगल, जमीन हमारा है नारा के साथ नेटरहात से दो सौ के करीब ग्रामीणों ने राज्यभवन पहुंच कर राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा. ज्ञापन देकर ग्रामीणों ने नेतरहाट फायरिंग रेंज रद्द करने की मांग किया है.  लातेहार जिले के नेतरहाट के सत्याग्रह स्थल टुटूवापानी से नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज को रद्द कराने की मांग अब को लेकर अब आंदोलन तेज हो गया है. पहले नेतरहाट की वादियों में आंदोलन चल रहा था. लेकिन सोमवार को केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति के केन्द्रीय सचिव जेरोम जेराल्ड कुजुर के नेतृत्व में पद यात्रा कर आंदोलनकारी फायरिंग रेंज रद्द करने की मांग के साथ राजधानी रांची पहुंचे. केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति लातेहार, गुमला के बैनर तले ग्रामीणों ने राजभवन पहुंच कर राज्यपाल को ज्ञापन देकर इसे रद्द करने की मांग किया है.

    पदयात्रा नेतरहाट की वादियों से निकल कर चिलचिलाती धूप में टुटूवापानी से बनारी, विशुनपुर, आदर, घाघरा, टोटाम्बी, गुमला, सिसई, भरनो, बेड़ो, गुटुवा तालाब, कटहलमोड़, पिस्का मोड़, रातू रोड होते 25 अप्रैल को रांची (राजभवन) पहुंची. यात्रा में प्रभावित क्षेत्र के 200 से अधिक आंदोलनकारी महिला और पुरुष के साथ युवा भी शामिल हुए. पदयात्रा में फिल्म निर्देशक  राम डाल्टन भी शामिल हुए. आपको बता दें कि इस आंदोलन की पृष्ठभूमि पर एक फ़िल्म का ताना बाना बुना गया. पटकथा लिखी गयी और फ़िल्म थंडर स्प्रिंग बनाई गयी है. निर्देशक राम डाल्टन  ने कहा कि मौका मिले तो फ़िल्म जरूर देखें. इसमें दिखाया गया है कि कैसे लोग जान देने को तैयार हैं, लेकिन अपनी जमीन किसी सूरत में देने को तैयार नहीं हैं.

    28 वर्षों से चल रहा आंदोलन

    एकीकृत बिहार के समय में 1954 में मैनूवर्स फील्ड फायरिंग आर्टिलरी प्रैटिक्स एक्ट, 1938 की धारा 9 के तहत नेतरहाट पठार के 7 राजस्व ग्राम को तोपाभ्यास (तोप से गोले दागने का अभ्यास) के लिए अधिसूचित किया गया था. 1991 और 1992 में फायरिंग रेंज अवधि विस्तार करते हुए इसकी 1992 से 2002 तक कर दी गई. केवल अवधि का ही विस्तार नहीं हुआ. क्षेत्र का विस्तार करते हुए और 7 गांव से बढ़ाकर 245 गांव को अधिसूचित किया गया. 22 मार्च 1994 को फायरिंग अभ्यास के लिए आई सेना को महिलाओं की अगुवाई में बिना अभ्यास के वापस जाने पर मजबूर कर दिया गया था. ये आंदोलन पिछले 28 वर्षों से चल रहा है.

    रिपोर्ट: प्रकाश तिवारी,रांची   

     


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