जानिए संताल परगना के विकास का हाल : न पीने का पानी, न स्कूल, एम्बुलेंस की जगह खाट-डोली से पहुंचते अस्पताल

    जानिए संताल परगना के विकास का हाल : न पीने का पानी, न स्कूल, एम्बुलेंस की जगह खाट-डोली से पहुंचते अस्पताल

    रांची (RANCHI) :    इतिहासकारों द्वारा भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम लड़ाई के रूप में 1857 के सिपाही विद्रोह को स्थान दिया है. लेकिन इसके पूर्व ही अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ सिदो, कान्हू,चांद और भैरव ने बगावत की थी, जिसके प्रतिफल के रूप में 22 दिसंबर 1855 को बीरभूम से काटकर संताल परगना को अलग जिला बनाया गया. इसका मुख्यालय दुमका था. कालांतर में संताल परगना कमिश्नरी बन गया और उससे काटकर 6 जिले बनाये गए. आज संताल परगना का 166 वा स्थापना दिवस है. जिला मुख्यालय से लेकर सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में इसको लेकर कार्यक्रम भी आयोजित किए गए, लेकिन 166 वर्षों में संथाल समुदाय का कितना विकास हुआ. जमीनी हकीकत दिखाने के लिए हम आपको ले चलते हैं दुमका जिला के शिकारीपाड़ा प्रखंड के करमाचुवां गांव में.

    डोली के सहारे अस्पताल पहुंचती प्रसूता

    50 घरों की यह बस्ती प्रखंड मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर दूर है. लेकिन गांव तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है. पथरीली रास्तों से सफर कर ग्रामीण प्रखंड मुख्यालय पहुचते हैं. ग्रामीण होपना हांसदा कहते हैं कि गांव में कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं है. प्रसव वेदना से तड़पती महिलाओं को डोली के सहारे सड़क तक पहुंचाया जाता है. गांव में 5वीं तक पढ़ाई की सुविधा है. उससे आगे की पढ़ाई छात्र नहीं कर पाते. सबसे गंभीर संकट पेयजल का है. कहने के लिए तो गांव में 4 चापानल हैं. लेकिन सभी वर्षों से खराब है. ग्रामीण मेसो हांसदा का कहना है कि गांव में सोलर आधारित जलापूर्ति के लिए दो जगह टंकी लगाया गया लेकिन दोनों ही खराब है. ग्रामीण सालों भर नदी और झरना का पानी पीते हैं.

    वोट मांगने आते नेता जी

    अधिकारी कभी गांव आते नहीं और ग्रामीण कभी प्रखंड मुख्यालय पहुंचकर अपनी बात अधिकारी के समक्ष रखते नहीं. चुनाव के वक्त वोट मांगने नेता जी जरूर पहुचते हैं, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ मिलता नहीं. यह हाल उस विधान सभा का है जहां से 7 टर्म से नलिन सोरेन विधायक हैं. सांसद के रूप में वर्षों तक शिबू सोरेन ने यहां का प्रतिनिधित्व किया. फिलहाल भाजपा के सुनील सोरेन सांसद हैं.

    कागजों पर विकास

    दुमका के समाजसेवी सचिदानंद सोरेन ने कहा कि 166 वर्षों में भी संथाल समाज की स्थिति पर कोई खास बदलाव नहीं होना दुखद है. वह भी तब जबकि संथाल के नाम पर झारखंड में सभी राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते रहे हैं. गांव में विकास का हाल देखकर तो यही कहा जा सकता है कि यहां कागज पर खेती होती है, जिस पर कलम का हल चलता है, स्याही से सिंचाई होती है और आंकड़ों का उत्पादन होता है और वही आंकड़ा अधिकारी सरकार के समक्ष रख कर अपनी पीठ थपथपाता है.


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