भाकपा माओवादी के शीर्ष नेता प्रशांत बोस उर्फ किशन दा कौन थे, पढ़िए पूरी खबर

    भाकपा माओवादी के शीर्ष नेता प्रशांत बोस उर्फ किशन दा कौन थे, पढ़िए पूरी खबर

    टीएनपी डेस्क(TNP DESK): नक्सलियों के शीर्ष नेता प्रशांत बोस उर्फ किशन दा की गिरफ़्तारी ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है. झारखंड पुलिस की इस कार्रवाई की पूरे देश भर में तारीफ हो रही है. पुलिस ने गहन छानबीन और छापेमारी के दौरान छह नक्सलियों को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार छः व्यक्तियों में से प्रशान्त बोस और शीला मराण्डी संपूर्ण भारत के भाकपा(माओवादी) के शीर्षस्थ नेताओं में से एक हैं. प्रशांत बोस की गिरफ़्तारी अर्द्धसैनिक बलों के लिए बड़ी उपलब्धि है. इनकी गिरफ्तारी से भाकपा(माओवादी) संगठन को बहुत बड़ा झटका लगा  है. आखिर प्रशांत बोस कौन थे कि उन पर सरकार ने एक करोड़ का इनाम रखा था, उसके काले-कारनामों के बारे में शायद ही कोई विस्तार से जानता होगा. हम आपको आज वही बताएंगे.

    कौन है प्रशांत बोस?

    प्रशांत बोस उर्फ किशन दा उर्फ मनीष उर्फ बुढा 60 के दशक में पढाई के दौरान कोलकाता में नक्सली संगठन के मजदूर यूनियन संगठन से जुड़े. इससे प्रशांत दा इस कदर प्रभावित हुए कि पूर्ण समर्पण भाव से संगठन के लिए काम करने लग गए. इसी दौरान ये एमसीसीआई के संस्थापक में से एक कन्हाई चटर्जी के संपर्क में आए. उन्हीं के साथ में किशन दा गिरिडीह, धनबाद, बोकारो एवं हजारीबाग जिलों में पहुंचे. इन ईलाकों में स्थानीय जमींदारी प्रथा और महाजनों के द्वारा स्थानीय जनता के शोषण एवं प्रताड़ना के विरुद्ध संथाली नेताओं के द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन के समर्थन में एमसीसीआई के बैनर तले आन्दोलन को मुखर करने के लिये ये लोग भी इस आंदोलन से जुड़ गए. जहां इन्होंने ने रतिलाल मुर्मू के साथ मिलकर धनबाद, गिरिडीह, बोकारो एवं हजारीबाग के क्षेत्रों में स्थानीय जमींदारों के द्वारा गठित सनलाईट सेना एवं महाजनों के विरूद्ध 2000 ईसवी तक आन्दोलन करते रहे.  इस क्षेत्र के अलावा जमींदारों के द्वारा गठित बिहार के जहानाबाद, भोजपूर, गया के ईलाके में सक्रिय रणबीर सेना, ब्रहमर्शी सेना और पुलिस के विरुद्ध लड़ाई लड़ते हुए झारखण्ड के पलामू, चतरा, गुमला, लोहरदगा, कोल्हान और संथाल परगना क्षेत्र में अपने संगठन को मजबूत किया. इस दौरान इन्होंने बिहार-झारखण्ड (तत्कालीन बिहार), बंगाल-उड़ीसा राज्य क्षेत्र में कई बड़ी नक्सली घटनाओं को अंजाम दिया. इसी क्रम में वर्ष 1974 में किशन दा को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेजा गया. वर्ष 1978 में जेल से निकलने के बाद वे पुनः संगठन में शामिल हो गये और पिछले पांच दशक से संगठन के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं.

    किस-किस घटना में थे शामिल

    प्रशांत बोस उर्फ किशन दा पर दर्ज मामलों की बात करें तो इसकी गिनती बहुत दूर तक जाती है. इनपर 50 से भी ज्यादा मामले राज्य के अलग-अलग जिलों के थानों में दर्ज है. जानकारी के लिए रांची में एक, खूंटी में चार, गुमला में तीन, चाइबासा में 31, सरायकेला में तीन, जमशेदपुर में तीन, हजारीबाग में दो, बोकारो में दो और चक्रधरपुर रेल में एक मामला दर्ज है. इन्होंने इन मामलों के तहत कई बड़ी नक्सली घटनाओं को अंजाम दिया है. इन घटनाओं में तत्कालीन पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) के सांसद सुनील महतो की हत्या भी शामिल है. साल 2009 में पश्चिमी सिंहभूम जिला के गोईलकेरा थानान्तर्गत चितिर घाटी में एलआरपी के दौरान किशन दा के नेतृत्व में माओवादियों द्वारा बारूदी सुरंग विस्फोट किया गया था जिसमें सीआरपीएफ 7वीं बटालियन एफ कम्पनी के तीन अधिकारी और सात जवान शहीद हो गए थे. इसी तरह के कई नक्सली और पुलिस मुठभेड़ में कई पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों की शहादत हुई है और दर्जनों जवान घायल हो चुके हैं. जिसके पीछे प्रशांत बोस का ही हाथ था. वर्तमान में प्रशांत बोस माकपा(माओवादी) नक्सली संगठन के ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो के सचिव एवं थिंक टैंक के रूप में काम कर रहे थे. पोलित ब्युरो सदस्य प्रशांत बोस के उपर झारखंड सरकार द्वारा एक करोड़ रुपए का पुरस्कार घोषित था.

     


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