फाल्गुन पूर्णिमा की रात वरदान की सभी शर्तें पूरी हुईं और अधर्म का अंत हुआ...

    फाल्गुन पूर्णिमा की रात वरदान की सभी शर्तें पूरी हुईं और अधर्म का अंत हुआ...

    TNP DESK  : फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को मनाया जाने वाला होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आस्था विश्वास और सत्य की विजय का प्रतीक है. होली से एक दिन पूर्व होने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखता है. देशभर में श्रद्धालु लकड़ियां और उपले एकत्र कर सामूहिक रूप से अग्नि प्रज्वलित करते हैं और बुराइयों के दहन का संकल्प लेते हैं.

    भागवत पुराण और विष्णु पुराण में मिलता है होलिका दहन का उल्लेख

    होलिका दहन का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों जैसे भागवत पुराण और विष्णु पुराण में मिलता है. कथा के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक असुर राजा ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान प्राप्त किया था जिसके कारण वह लगभग अजेय हो गया. वरदान के प्रभाव से वह अत्याचारी और अहंकारी बन बैठा तथा स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा. लेकिन उसके पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे. पिता के लाख प्रयासों और धमकियों के बावजूद प्रह्लाद ने भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी. इससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपने ही पुत्र को मृत्यु दंड देने का निर्णय लिया.

    फाल्गुन पूर्णिमा की रात अग्नि प्रज्वलित की गई और ...

    हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था. योजना बनाई गई कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, जिससे प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाएं. फाल्गुन पूर्णिमा की रात अग्नि प्रज्वलित की गई और होलिका प्रह्लाद को लेकर उसमें बैठ गई. किंतु ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे जबकि होलिका स्वयं अग्नि में जलकर भस्म हो गई. इस घटना को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में देखा जाता है तभी से होलिका दहन की परंपरा प्रारंभ हुई.

    वरदान की सभी शर्तें पूरी हुईं और अधर्म का अंत हुआ

    कथा के अनुसार जब हिरण्यकश्यप ने स्वयं प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया तब भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण किया. संध्या समय दहलीज पर आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में उन्होंने हिरण्यकश्यप का वध किया. इस प्रकार वरदान की सभी शर्तें पूरी हुईं और अधर्म का अंत हुआ.

    लोग अग्नि की परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

    होलिका दहन केवल धार्मिक कथा तक सीमित नहीं है इसका सामाजिक और कृषि से भी गहरा संबंध है. ग्रामीण क्षेत्रों में नई फसल की बालियां अग्नि में सेंकी जाती हैं जिसे समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है लोग अग्नि की परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

    यह पर्व सामूहिकता और सामाजिक एकता का संदेश देता है

    समाजशास्त्रियों के अनुसार यह पर्व सामूहिकता और सामाजिक एकता का संदेश देता है. मोहल्लों और गांवों में लोग एकत्र होकर होलिका दहन करते हैं, जिससे आपसी मेल-जोल बढ़ता है। साथ ही यह पर्व नकारात्मक प्रवृत्तियों, ईर्ष्या और द्वेष को त्यागने का संदेश भी देता है.

    शुभ मुहूर्त और भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है

    आधुनिक समय में भले ही त्योहारों का स्वरूप बदल रहा हो लेकिन होलिका दहन की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. कई स्थानों पर शुभ मुहूर्त और भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल में होलिका दहन वर्जित माना जाता है इसलिए लोग पंचांग देखकर ही अग्नि प्रज्वलित करते हैं.

    सत्य, भक्ति और धर्म की राह पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजयी होता है

    होलिका दहन का इतिहास हमें यह संदेश देता है कि सत्य, भक्ति और धर्म की राह पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजयी होता है. चाहे परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, ईश्वर पर विश्वास और नैतिक मूल्यों की शक्ति बुराई को परास्त कर सकती है. फाल्गुन पूर्णिमा की यह अग्नि केवल लकड़ियों का दहन नहीं बल्कि अहंकार अत्याचार और नकारात्मकता के अंत का प्रतीक है और यही इस पर्व की सबसे बड़ी सीख है.

     

     


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