कड़ाके की ठंड में बेघर ज़िंदगियां, रांची में प्लास्टिक के बोरे में रात गुज़ारने को मजबूर आदिवासी महिलाएं

    कड़ाके की ठंड में बेघर ज़िंदगियां, रांची में प्लास्टिक के बोरे में रात गुज़ारने को मजबूर आदिवासी महिलाएं

    रांची (RANCHI): राजधानी रांची में ठंड अपने चरम पर पहुंच चुकी है. तापमान लगातार गिर रहा है और शीतलहर ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है. जिला प्रशासन और नगर निगम की ओर से ठंड से बचाव के पुख्ता इंतज़ामों के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है.

    शहर के कई इलाकों में आज भी ऐसी ज़िंदगियां हैं, जो खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर हैं. तस्वीरें रांची की हैं, जहां ग्रामीण क्षेत्रों से रोज़गार की तलाश में आई आदिवासी महिलाएं कड़ाके की ठंड में प्लास्टिक के बोरे ओढ़कर किसी तरह रात काट रही हैं. न उनके पास कंबल है, न रैन बसेरे की सुविधा और न ही किसी तरह की सरकारी मदद.

    अनगड़ा, जोन्हा और आसपास के कई गांवों से ये महिलाएं रोज़ शहर आती हैं. पत्ता, दातुन और रेज़ा बेचकर ये अपनी आजीविका चलाती हैं. दिनभर मेहनत के बाद जब रात होती है, तो इन्हें ठंड से बचने के लिए प्लास्टिक के बोरे और खुले स्थानों का सहारा लेना पड़ता है. कई महिलाएं फुटपाथ, बस स्टैंड या दुकानों के बाहर रात गुज़ारती हैं.

    स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की ओर से समय-समय पर रैन बसेरा और कंबल वितरण की बात तो होती है, लेकिन ज़रूरतमंदों तक यह मदद नहीं पहुंच पा रही है. ठंड के इस मौसम में सबसे अधिक जोखिम इन्हीं महिलाओं और बेघर लोगों को है, जिनके पास न छत है और न पर्याप्त गर्म कपड़े.

    समाजसेवियों का मानना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ठंड के कारण जनहानि का खतरा बढ़ सकता है. ज़रूरत है कि प्रशासन ज़मीनी स्तर पर हालात का जायज़ा ले और बेघर व जरूरतमंद लोगों तक तत्काल राहत पहुंचाए, ताकि कड़ाके की ठंड में कोई भी ज़िंदगी असहाय न रहे.


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