घूप अंधेरे में एक ही राग, मोदी जी करेंगे बेड़ा पार! देखिये वर्ष 2023 में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका में कहां खड़ा रही भाजपा और बाबूलाल

    घूप अंधेरे में एक ही राग, मोदी जी करेंगे बेड़ा पार! देखिये वर्ष 2023 में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका में कहां खड़ा रही भाजपा और बाबूलाल

    Ranchi: 2023 अपनी तमाम उपलब्धियों और नाकामियों के साथ विदाई की ओर है. अब हम नववर्ष की दहलीज पर खड़ा होकर गुजरे वर्ष की चुनौतियों और नाकामियों के मूल्यांकन में जुटे हैं. लेकिन यदि हम बात वर्ष 2023 में झारखंड के सियासी उठापटक की करें तो इस वर्ष की शुरुआत ही हेमंत सरकार की विदाई की तमाम आशंकाओं के बीच हुई थी, और इसके साथ ही भाजपा खेमे में एक खुशफहमियां भी साथ घूम रही थी कि खनन घोटाला, जमीन घोटला और मनिलांड्रिंग के आरोपों का सामना कर रही यह सरकार और इसके मुखिया ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों के दवाब में आखिरकार कांग्रेस का दामन छोड़ कर कमल के साथ गलबहियां कर सत्ता की मलाई खाने को विवश होंगे. और उस हालत में केक का पूरा टुकड़ा ना सही तो कम से कम सत्ता की मलाई का एक हिस्सा तो हाथ आयेगा.

    झारखंड में भाजपा कार्यकर्ताओं को अच्छे दिन का इंतजार

    और 2023 के साथ हुआ यह सुहाना सफर 2024 के अंत तक बना रहा. अखबारों की सुर्खियां और टीवी चैनलों के तमाम आकलनों का लुत्फ उठाते भाजपा कार्यकर्ताओं के द्वारा अच्छे दिन के सपने देखे जाते रहे. अंदरखाने यह खुशफहमी थी कि यह तो मोदी हैं, और मोदी है तो मुमकिन है. फिर भला यह हेमंत किस खेत की मूली है, लेकिन साल का अंत होते होते हेमंत सोरेन इस नारे के साथ सामने आयें कि हमारी सरकार आदिवासी-मूलवासियों की सरकार है, खेत में लगी गाजर-मूली नहीं कि भाजपा उखाड़ ले जाये.

    विपक्ष की भूमिका में कहां खड़ी हुई भाजपा

    हेमंत सरकार के ये दावे अपनी जगह, उसकी उपलब्धियां और नाकामियां अपनी जगह. अपने चुनावी जुमलों की दिशा में हेमंत सरकार कितना कदम आगे बढ़ी, वह भी अपनी जगह. 1932 का खतियान, सरना धरम कोड, पिछड़ों को आरक्षण विस्तार और राज्य में कार्यरत कंपनियों में स्थानीय युवाओं के लिए 75 फीसदी आरक्षण को उछाल कर मूलवासियों-आदिवासियों में अपने को स्थापित करने की कोशिश भी अपनी जगह, और हेमंत सरकार की इन कोशिशों से आदिवासी-मूलवासियों की जिंदगी में क्या बहार आयी?  सब कुछ अपनी जगह, यहां मुख्य सवाल यह है कि इस पूरे वर्ष में भाजपा एक विपक्षी दल के बतौर अपने दायित्वों के निर्वहन में कितनी सफल रही?

    पूरे वर्ष सड़क से गायब क्यों नजर आयी भाजपा

    हेमंत सरकार अब गिरी कि तब गिरी की खुशफहमी से आगे निकल और इस सपने को छोड़कर कि हेमंत सोरेन इन जांच एंजेसियों के दबाव में आखिरकार कांग्रेस का दामन साथ छोड़कर भाजपा के साथ सत्ता का रसास्वादन करेगी, हेमंत सरकार की नाकामियों के खिलाफ सड़क पर उतर भाजपा कब और कहां संघर्ष करती नजर आयी? राजधानी रांची में कुछ एक प्रदर्शनों को छोड़ कर, मोदी हैं तो संभव है के हसीन सपने से बाहर निकल वह राज्य के दूसरे हिस्से में हेमंत सरकार की नाकामियों के खिलाफ कब और कहां मोर्चा खोलती नजर आयी?

    क्या बाबूलाल की वापसी के बाद भी टूट रहा भाजपा का सपना

    जनवरी से दिसम्बर का महीना गुजरने को है, लेकिन एक सशक्त विपक्ष की गंभीर भूमिका में भाजपा कहीं भी खड़ी नजर क्यों नहीं आयी? जानकारों का दावा है कि बाबूलाल को जिस हसीन सपनों के साथ पार्टी में लाया गया था,  हर बीतते लम्हे के साथ वह सपना टूटता नजर आ रहा है. बाबूलाल की वापसी के पहले भी भाजपा कई टुकडों में  विभाजित थी, बाबूलाल की वापसी के बाद एक टुकड़ा और बढ़ गया. आज भी बाबूलाल अपने आप को पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने का जद्दोजहद कर रहे हैं. और यही कारण है कि पार्टी अध्यक्ष के रुप में करीबन छह माह के कार्यकाल की समाप्ति के बावजूद वह अपनी कोट कमिटी का गठन नहीं कर पाये. राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक वही पुरानी कमेटियां काम कर रही है. बाबूलाल की ताजपोशी के बाद पुरानी कमेटी के चेहरे भी असमंजस में हैं, अब उनका क्या होगा. उनकी आगामी भूमिका क्या होगी. उनका भविष्य क्या होगा, और जब नयी कमिटी की घोषणा होगी तब कहीं रघुवर दास का ठप्पा लगाकर किनारा तो नहीं कर दिया जायेगा?

    पुराने चेहरे कोई रिस्क लेने के बजाय समय काटने की कोशिश कर रहे हैं

    और यही कारण है कि पुराने चेहरे अपनी उर्जा लगाने को तैयार नहीं है, और इधर बाबूलाल अपनी नयी कमिटी बनाने का जोखिम नहीं उठा रहे, हालांकि बीच-बीच में यह खबर भी आयी कि बाबूलाल नयी कमिटी का गठन करने को प्रयत्नशील है, लेकिन हर बार पुराने दिग्गज बाबूलाल के अरमानों पर पानी फेरने में सफल हो रहे हैं. हर किसी की पहुंच दिल्ली दरबार में है. इस हालत में बाबूलाल की दुविधा है कि किस चेहरे को आगे करें और किस चेहरे को पीछे और यदि इस उठापटक में दिल्ली दरबार की नाराजगी हुई तो खुद अपनी कुर्सी भी दांव लग सकती है.

    2024 का महासंग्राम में कहां खड़ा हैं बाबूलाल और आज की भाजपा

    और अब जबकि 2024 का महासंग्राम सामने खड़ा है, और यहां परीक्षा सिर्फ पीएम मोदी के चेहरे की नहीं होनी है, असली परीक्षा तो बाबूलाल की होनी है, यदि बाबूलाल आज के 12 सांसदों की तुलना में कम से कम 10 सांसद भी जीता कर दिल्ली दरबार में पहुंचाने में सफल रहते हैं. तो यकीन मानिये, यह फतह पीएम मोदी के चेहरे की मानी जायेगी और यदि यह संख्या 5-6 में लटक जाती है तो गाज बाबूलाल पर गिरना तो तय है. क्योंकि यदि हम भाजपा का दिल्ली दरबार और पीएम मोदी की प्रवृतियों को समझने की कोशिश करें तो हर जीत पीएम मोदी के चेहरे की जीत होती है, लेकिन हार का ठीकरा स्थानीय क्षत्रपों पर फोड़ी जाती है.

    बाबूलाल की वापसी की मुख्य वजह

    और दूसरी बात तमाम क्षत्रपों को किनारा आखिर बाबूलाल की वापसी क्यों करवायी गयी थी, और सिर्फ बाबूलाल ही नहीं, आज के दिन झारखंड भाजपा की पूरी कमान ही उधारी नेताओं के हाथ में हैं, कोई भी चेहरा ऐसा नहीं है, जो मूल रुप से भाजपा का हो, किसी की इंट्री झामुमो से हुई है, किसी को लम्बे वनवास के बाद वापसी करवायी गयी है, खासकर बाबूलाल की वापसी तो एक विशेष सियासी माहौल में करवायी गयी. वर्ष 2014 में जैसे ही झारखंड में भाजपा को बिना चेहरे की जीत मिली, तो इसके साथ ही झारखंड के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग किये जाने का दावा किया गया. दावा किया गया कि जिस झारखंड को आदिवासी बहुल राज्य माना जाता था, भाजपा और पीएम मोदी ने एक गैर आदिवासी चेहरे को सीएम बनाकर अपना मास्टर कार्ड खेला है, लेकिन भाजपा का यही मास्टर कार्ड 2019 में सियासी मुसीबत बन कर खड़ा हो गया. आदिवासी आरक्षित 28 सीटों से एक साथ उसकी विदाई हो गयी. और उसके बाद यह खलबली तेज हुई कि अब बगैर किसी आदिवासी-मूलवासी चेहरे को आगे किये सत्ता के इर्द गिर्द भटकना भी नामुमिकन है. और उसके बाद ही बाबूलाल की वापसी का रास्ता साफ हुआ, और तब भाजपा आलाकमान ने तमाम स्थापित चेहरों को दरकिनार कर अमर बाऊरी से लेकर जेपी पेटल पर दांव लगाने का फैसला किया, नहीं तो वर्ष 2014 के पहले पहले तक इन चेहरों का झारखंड की सियासत में अपना कोई वजूद नहीं था.

    झामुमो के कोर वोटरों में सेंधमारी बाबूलाल की अग्नि परीक्षा

    लेकिन सवाल भी वहीं जाकर खड़ा हो जाता है कि जिन चेहरों को आगे किया गया है, क्या उन चेहरों पर पार्टी को विश्वास भी है, या महज इन चेहरों को आगे कर आदिवासी-मूलवासी समाज में एक भ्रम पैदा करने की कोशिश की गयी है. सच्चाई चाहे जो हो, लेकिन इतना तय है कि यदि लोकसभा चुनाव में बाबूलाल झामुमो का कोर वोटर आदिवासी मतदाताओं की सेंधमारी में असफल रहते हैं, तो वर्ष 2024 उनके लिए एक बार फिर से राजनीतिक अवसान का वर्ष बन सकता है.

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