नीतीश कुमार का “कुर्मी पॉलिटिक्स” और हेमंत सोरेन का 'आदिवासी चेहरा' साथ आते ही टूट सकता है भाजपा पर मुसीबतों का पहाड़

    नीतीश कुमार का “कुर्मी पॉलिटिक्स” और हेमंत सोरेन का 'आदिवासी चेहरा' साथ आते ही टूट सकता है भाजपा पर मुसीबतों का पहाड़

    रांची(RANCHI):  विपक्षी एकता की मुहिम की हसरतें लिए नीतीश कुमार इन दिनों विभिन्न सियासी दलों के प्रमुखों से लगातार मुलाकात रहे हैं. उनकी कोशिश 2024 के पहले विपक्षी एकता की उस पिच को तैयार करने की है, जहां से ब्रांड मोदी के खिलाफ चौकें-छक्के की बरसात की जा सकें.  

    सीएम हेमंत से आज होनी है मुलाकात

    इसी कोशिश में वह कल वह ओडिशा में नवीन पटनायक के साथ मिल-बैठ कर हिन्दुस्तान की भावी राजनीति की रुप रेखा तैयार कर रहे थें और आज उनकी मुलाकात सीएम हेमंत से होनी है, माना जा रहा है कि इस मुलाकात की पिच पहले ही तैयार कर दी गयी थी, अभी कुछ दिन पहले ही जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने सीएम हेमंत से मुलाकात की थी, उसी कड़ी को अब आगे बढ़ाते हुए अब सीएम नीतीश और सीएम हेमंत की यह मुलाकात रखी गयी है.

    नीतीश से हाथ मिलाने से सीएम हेमंत को मिल सकता है लाभ

    माना जाता है कि दोनों के बीच प्रारम्भिक बात पहले ही पूरी कर ली गयी है, यह मुलाकात महज एक औपचारिकता है, जहां से विपक्षी गठबंधन में सीएम हेमंत के शामिल होने की औपचारिक घोषणा भर की जानी है. हालांकि इसके साथ ही कई शर्ते और समीकरणों की चर्चा की गुंजाइश अभी बनी हुई है. लेकिन झारखंड की वर्तमान राजनीति समीकरणों को देखते हुए सीएम हेमंत के लिए यह बड़ा सौदा भी हो सकता है, सीएम नीतीश का साथ मिलते ही झारखंड की राजनीति में एक बड़ा सियासी बदलाव आने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.

    कुर्मी पॉलिटिक्स दिग्गज नीतीश कुमार

    यहां बता दें कि नीतीश कुमार को कुर्मी पॉलिटिक्स दिग्गज माना जाता है, हालांकि अति पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के बीच भी उनकी छवि बहुत अच्छी मानी जाती है, जबकि झारखंड में कुर्मी-महतो की पूरी आबादी करीबन 25 फीसदी के आसपास मानी जाती है. इस वोट को साधने के लिए झामुमो बराबर राजनीतिक प्रयोग किया करता है, लेकिन इस कुर्मी वोट पर सबसे बड़ा दावा आजसू का माना जाता है.

    झारखंड में भाजपा की प्राण वायू है कुर्मी महतो वोट

    भाजपा के हाथ से जब भी यह कुर्मी वोट छिटका है, उसकी राजनीतिक जमीन बेहद खस्ताहाल हो गयी है, पिछले विधान चुनाव में झारखंड में भाजपा की हार की सबसे बड़ी वजह उसका आजसू से अलगाव था. रामगढ़ उपचुनाव में इसकी परीक्षा हो चुकी है, साफ है कि कुर्मी महतो वोट ही वह प्राण वायू जिसके सहारे झारखंड में भाजपा की राजनीति घूमती है और आज की स्थिति में झारखंड में कुर्मियों का सबसे बड़ा चेहरा आजसू प्रमुख सुदेश महतो का है, भाजपा ने जब भी सुदेश महतो के सियासी कद को छोटा करने की सोची है, उसकी जमीन उखड़ गयी है, पिछली बार की बगावत से भी भाजपा को भी सुदेश महतो के सियासी ताकत का अंदाज हो गया है.

    कुर्मी मतदाताओं पर झामुमो की भी रहती है नजर  

    साफ है कि जिस कुर्मी महतो वोट की जरुरत भाजपा को है, वही जरुरत झामुमो की भी है. हालांकि झामुमो में आज भी कई महत्वपूर्ण कुर्मी चेहरे हैं, लेकिन बावजूद इसके झामुमो को कई बार राजनीतिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

    सीएम नीतीश और हेमंत के साथ आते ही बदल सकता है झारखंड का सियासी समीकरण

    लेकिन सीएम हेमंत और नीतीश कुमार को साथ आते ही यह स्थिति पूरी तरह से बदल भी सकती है. क्योंकि आज भी नीतीश कुमार का चेहरा यहां किसी भी स्थानीय कुर्मी नेताओं से ज्यादा मजबूत और सशक्त है. साफ है कि सीएम नीतीश और हेमंत की यदि जुगलबंदी होती है, तो इसका सीधा नुकसान भाजपा को होगा. क्योंकि आजसू चाह कर भी अपने तमाम वोटों को भाजपा में हस्तांरित करवाने की स्थिति में नहीं होगी, साथ ही उसकी बारगेनिंग क्षमता में भी गिरावट आयेगी.  


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