रांची (RANCHI) : झारखंड में शहरी स्थानीय निकाय (नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत) चुनाव एक बार फिर सुर्खियों में हैं. राज्य में करीब सात साल से निकाय चुनाव नहीं हो पाए हैं. आखिरी बार झारखंड में निकाय चुनाव जनवरी 2018 में हुए थे. इसके बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल पूरा हो चुका है, लेकिन आज भी शहरी निकाय प्रशासकों के भरोसे चल रहे हैं. जनवरी 2018 से दिसंबर 2025 तक का समय देखा जाए तो झारखंड में लगभग 7 साल से अधिक समय से निकाय चुनाव लंबित हैं. इस दौरान शहरी जनता को अपने जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार नहीं मिल पाया है. ऐसे में सवाल उठना लीजमि है कि आखिर देरी की वजह क्या है?
ओबीसी आरक्षण बना सबसे बड़ा रोड़ा
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार स्थानीय निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण देने के लिए ट्रिपल टेस्ट जरूरी है. इसके अलावा राज्य में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन, आंकड़ों के आधार पर पिछड़ेपन का अध्ययन और आरक्षण की सीमा 50% से अधिक न हो. झारखंड में लंबे समय तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी, जिससे चुनाव टलते चले गए.
वार्ड परिसीमन और आरक्षण निर्धारण में देरी
नई जनसंख्या और शहरी विस्तार के अनुसार वार्डों का परिसीमन और सीटों का आरक्षण तय करना जरूरी था. यह प्रक्रिया भी समय पर पूरी नहीं हो पाई.
कोर्ट में मामला और कानूनी अड़चनें
निकाय चुनाव और आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर होती रहीं. हर बार चुनाव की तैयारी के बीच कानूनी अड़चन सामने आ जाती थी.
राजनीतिक सहमति का अभाव
राज्य सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच भी आरक्षण और चुनावी ढांचे को लेकर सहमति बनने में समय लगा. राज्य में निकाय चुनाव नहीं होने से शहरी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व खत्म हो गया. विकास कार्यों में जनभागीदारी कमजोर पड़ी. प्रशासकीय व्यवस्था पर निर्भरता बढ़ी. आम लोगों की समस्याएं सीधे उठाने वाला कोई निर्वाचित मंच नहीं रहा.
सरकार का दावा है कि ओबीसी आरक्षण से जुड़ी औपचारिकताएं अब लगभग पूरी हो चुकी हैं और निकट भविष्य में निकाय चुनाव कराने की तैयारी है. लेकिन सवाल यही है कि क्या इस बार लोकतंत्र की यह कड़ी समय पर जुड़ पाएगी या फिर शहरी जनता को और इंतजार करना पड़ेगा?
