टीएनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड की धरती को जल, जंगल और जमीन की रक्षा का पाठ पढ़ाने वाले 'धरती आबा' भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि हर साल 9 जून को मनाई जाती है. मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ ऐतिहासिक 'उलगुलान' (महाविद्रोह) का शंखनाद किया था. आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने और अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ लोहा लेने के कारण उन्हें 'धरती आबा' (जगत पिता) कहा गया. चक्रधरपुर के जंगलों से गिरफ्तारी के बाद, अंग्रेजों द्वारा जेल में दी गई अमानवीय यातनाओं के कारण 9 जून 1900 को रांची जेल में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली. उनका जीवन और विचार आज भी जनजातीय समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणापुंज हैं.

लेकिन रक्षा का पाठ पढ़ाने वाले 'धरती आबा' भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस और शहादत दिवस पर हर साल बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं. सरकारी मंचों से उनके बलिदान को याद किया जाता है, लेकिन हकीकत की जमीन पर उनके अपने ही वंशज बुनियादी सुविधाओं और न्याय के लिए तरस रहे हैं. बिरसा मुंडा के पैतृक गांव खूंटी जिले के उलिहातू में रहने वाले उनके पोते सुखराम मुंडा और उनके परिवार की स्थिति यह दर्शाती है कि सरकारी घोषणाएं और जमीनी हकीकत में कितना बड़ा फासला है.
जमीन अधिग्रहण और आधे-अधूरे मुआवजे का दर्द करीब 15 साल पहले एक स्कूल के मैदान के निर्माण के लिए सरकार ने सुखराम मुंडा की लगभग 27 डिसमिल (11,761 वर्ग फुट) उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण किया था. यह जमीन उनके घर के पास थी और तब उन्हें इसके बदले उतनी ही जमीन देने का भरोसा दिलाया गया था. सालों के इंतजार के बाद 15 नवंबर 2021 को मुख्यमंत्री के हाथों उन्हें जमीन के कागजात सौंपे गए, लेकिन वे केवल 12.5 डिसमिल के थे, जो कि अधिग्रहित जमीन के आधे से भी कम है. 80 वर्षीय सुखराम मुंडा का कहना है कि उन्हें न तो पूरी जमीन मिली और न ही बाकी हिस्से का कोई मुआवजा दिया गया. इसके अलावा, जो जमीन आवंटित की गई है, वह उनके गांव से 30 किलोमीटर दूर है, जिसे देखने वे आज तक नहीं जा पाए हैं.
आवास और पानी का संकट सुखराम मुंडा का 20 सदस्यों का संयुक्त परिवार आज भी एक कच्चे मकान में रहने को मजबूर है, जहां सर्दियों के मौसम में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. हालांकि उनके तीन बेटों में से दो चतुर्थ श्रेणी (ग्रुप-डी) के सरकारी कर्मचारी हैं, लेकिन बड़े परिवार के भरण-पोषण और कमजोर होती शारीरिक स्थिति के कारण खेती करना अब उनके लिए मुमकिन नहीं रह गया है. सरकार आदिवासियों के लिए 'बिरसा आवास योजना' चलाती है, लेकिन उनके परिवार को इसका लाभ नहीं मिला. इसके अतिरिक्त, पूरा परिवार आज भी 'चुआं' (छोटे कुएं जैसे गड्ढे) का पानी पीने को विवश है. जिला प्रशासन के आश्वासनों के बावजूद, उनकी बहू गंगी मुंडा के अनुसार, पानी की समस्या का कोई स्थाई समाधान नहीं हुआ है.

पड़पोती जौनी कुमारी का शिक्षा के लिए संघर्ष बिरसा मुंडा की पड़पोती और सुखराम मुंडा की बेटी, 28 वर्षीय जौनी कुमारी मुंडा की कहानी और भी भावुक करने वाली है. मुंडारी भाषा में बीए ऑनर्स की पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्हें कॉलेज के पास सब्जी तक बेचनी पड़ी. जब उनकी यह तस्वीर और मुख्यमंत्री के नाम पत्र वायरल हुआ, तो फिल्म अभिनेता सोनू सूद से लेकर कॉलेज प्रशासन तक ने मदद के बड़े-बड़े दावे किए. प्राचार्य ने फीस माफी और प्रशासन ने छात्रवृत्ति का भरोसा दिया.
परंतु, ये सारे आश्वासन भी आधे-अधूरे साबित हुए. जौनी के अनुसार, उन्हें केवल दो सेमेस्टर की किताबें मिलीं, लेकिन लैपटॉप के नाम पर सोनू सूद की व्यस्तता का बहाना बना दिया गया. छात्रवृत्ति का फॉर्म चार बार भरने के बाद भी उन्हें एक रुपया नहीं मिला और कॉलेज में जमा की गई फीस की रसीदों का पैसा भी वापस नहीं आया.

प्रशासन का पक्ष इस मामले पर अड़की प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) नरेंद्र का दावा अलग है. उनका कहना है कि जौनी मुंडा को लैपटॉप दे दिया गया है और परिवार को जमीन भी आवंटित की गई है. सरकारी नियमों के अनुसार, परिवार में सरकारी नौकरी होने के कारण उन्हें आवास योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता. उनका दावा है कि उलिहातू के बाकी लोगों को शहीद बिरसा आवास योजना का लाभ मिला है और बिरसा के परिवार को समय-समय पर सम्मानित कर लाभान्वित किया जाता रहा है. हालांकि, जौनी का यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि यदि बिरसा के नाम से जुड़े होने के बाद भी उनका यह हाल है, तो आम गरीब आदिवासियों की सुध कौन लेगा?


