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धूप कम, स्क्रीन टाइम ज्यादा! बच्चों में Vitamin D की कमी पर क्या कहते हैं डॉक्टर?

Rashmi Prasad
Rashmi Prasad
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टीनपी डेस्क (TNP DESK): आजकल बच्चों का बचपन मोबाइल, टैबलेट, टीवी और लैपटॉप की स्क्रीन के बीच ज्यादा गुजर रहा है. पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक कई काम स्क्रीन पर होने लगे हैं. इसका असर बच्चों की शारीरिक गतिविधियों और बाहर खेलने के समय पर भी पड़ रहा है. इसी वजह से बच्चों में पर्याप्त धूप न मिलने को लेकर Vitamin D की कमी की चिंता बढ़ रही है. Vitamin D शरीर में कैल्शियम के अवशोषण और हड्डियों के विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. बच्चों के बढ़ते शरीर के लिए इसका पर्याप्त स्तर जरूरी माना जाता है. हालांकि, केवल स्क्रीन टाइम को Vitamin D की कमी का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा.

धूप और Vitamin D का क्या है कनेक्शन?

शरीर में Vitamin D बनने का प्रमुख प्राकृतिक तरीका त्वचा का सूर्य की UVB किरणों के संपर्क में आना है. जब बच्चे लंबे समय तक घर के अंदर रहते हैं और बाहर खेलने या धूप में रहने का समय कम हो जाता है, तो उन्हें इस प्राकृतिक स्रोत का कम लाभ मिल सकता है. डॉक्टरों के अनुसार, बच्चों की दिनचर्या में उम्र के अनुसार आउटडोर खेल और शारीरिक गतिविधियों को शामिल करना जरूरी है. हालांकि, धूप कितनी देर और किस समय लेनी चाहिए, यह बच्चे की त्वचा, उम्र, मौसम, स्थान और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है. इसलिए केवल Vitamin D के लिए बच्चों को तेज धूप में लंबे समय तक रखना उचित नहीं है.

डॉक्टर किन लक्षणों पर ध्यान देने की सलाह देते हैं?

Vitamin D की कमी होने पर हर बच्चे में एक जैसे लक्षण दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है. कुछ बच्चों में हड्डियों या मांसपेशियों से जुड़ी परेशानी, कमजोरी, थकान या शारीरिक विकास से संबंधित समस्याएं दिखाई दे सकती हैं. छोटे बच्चों में गंभीर कमी होने पर हड्डियों के विकास पर असर पड़ सकता है. लेकिन इन लक्षणों के आधार पर खुद से Vitamin D की कमी मान लेना सही नहीं है. डॉक्टर जरूरत पड़ने पर बच्चे की मेडिकल हिस्ट्री, खान-पान, शारीरिक स्थिति और जांच रिपोर्ट के आधार पर स्थिति का आकलन करते हैं.

सिर्फ धूप नहीं, डाइट भी है जरूरी

बच्चों में Vitamin D का स्तर बनाए रखने के लिए सिर्फ धूप पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है. संतुलित आहार भी महत्वपूर्ण है. दूध और कुछ डेयरी उत्पाद, अंडे की जर्दी तथा Vitamin D से फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ इसके स्रोत हो सकते हैं. कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर सप्लीमेंट की सलाह भी दे सकते हैं. लेकिन बच्चों को अपनी तरफ से Vitamin D की हाई-डोज दवा या सप्लीमेंट देना ठीक नहीं है. जरूरत से ज्यादा Vitamin D भी शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए सप्लीमेंट की मात्रा और अवधि डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही तय होनी चाहिए.

स्क्रीन टाइम कम करें, एक्टिविटी बढ़ाएं

बच्चों की सेहत के लिए स्क्रीन टाइम को संतुलित करना बेहद जरूरी है. लंबे समय तक मोबाइल या टीवी देखने के बजाय बच्चों को उम्र के अनुसार आउटडोर गेम्स, साइकिलिंग, पैदल चलने और दूसरी शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है. इससे उन्हें बाहर समय बिताने का मौका मिलेगा और शारीरिक सक्रियता भी बढ़ेगी. माता-पिता को बच्चों के लिए ऐसी दिनचर्या बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जिसमें पढ़ाई, नींद, खेल, पौष्टिक भोजन और सीमित स्क्रीन टाइम के बीच संतुलन हो.

कब डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी?

अगर बच्चे में लगातार कमजोरी, हड्डियों या मांसपेशियों से जुड़ी परेशानी, विकास को लेकर चिंता या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है. डॉक्टर जरूरत के अनुसार जांच कराने का निर्णय ले सकते हैं. हर बच्चे को Vitamin D की जांच या सप्लीमेंट की जरूरत नहीं होती. सबसे जरूरी बात यह है कि स्क्रीन टाइम कम करने के साथ बच्चों को संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि की आदत दी जाए. Vitamin D को लेकर कोई भी सप्लीमेंट या उपचार शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना सुरक्षित तरीका है.

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