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क्या हर बढ़ी हुई शुगर में दवा लेना है जरूरी? जानिए कब दवाओं की जरूरत होती है और कब नहीं

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): आज के समय में डायबिटीज सबसे तेजी से बढ़ने वाली बीमारियों में शामिल हो चुकी है. अक्सर देखा जाता है कि जैसे ही किसी व्यक्ति की ब्लड शुगर रिपोर्ट सामान्य स्तर से ऊपर आती है, वह घबरा जाता है और बिना पूरी जानकारी के दवा लेना शुरू कर देता है. लेकिन क्या हर बढ़े हुए शुगर लेवल पर दवा लेना जरूरी है? विशेषज्ञों का मानना है कि इसका जवाब 'नहीं' है. खासकर टाइप-2 डायबिटीज के शुरुआती चरण में कई मामलों में केवल संतुलित खानपान, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर भी ब्लड शुगर को नियंत्रित किया जा सकता है. इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा शुरू करना सही नहीं माना जाता.

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां डायबिटीज के मरीजों की संख्या सबसे अधिक है. अनुमान है कि देश में 10 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं. यह बीमारी तब होती है जब शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता या फिर बना हुआ इंसुलिन सही तरीके से काम नहीं कर पाता. इंसुलिन अग्न्याशय (Pancreas) में बनने वाला एक महत्वपूर्ण हार्मोन है, जो भोजन से मिलने वाली शर्करा (ग्लूकोज) को ऊर्जा में बदलने का कार्य करता है. जब इसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है तो रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ने लगता है और डायबिटीज की स्थिति बन जाती है.

कैसे की जाती है डायबिटीज की जांच?

डायबिटीज की पहचान के लिए मुख्य रूप से तीन तरह के टेस्ट किए जाते हैं.
•    FPG (Fasting Plasma Glucose): 8 से 10 घंटे खाली पेट रहने के बाद ब्लड शुगर की जांच. 
•    RPG (Random Plasma Glucose): दिन में किसी भी समय ब्लड शुगर की जांच. 
•    HbA1c टेस्ट: पिछले लगभग तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर की जानकारी देता है. 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का फास्टिंग ब्लड शुगर 126 mg/dL या उससे अधिक और HbA1c 6.5 प्रतिशत या उससे ज्यादा हो, तो उसे डायबिटीज की श्रेणी में रखा जाता है.

डायबिटीज कितने प्रकार की होती है?

डायबिटीज मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है. टाइप-1 डायबिटीज में शरीर का इम्यून सिस्टम इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नष्ट कर देता है, जिसके कारण मरीज को जीवनभर इंसुलिन पर निर्भर रहना पड़ता है. वहीं टाइप-2 डायबिटीज में शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या उसका प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं कर पाता. भारत में अधिकांश मरीज टाइप-2 डायबिटीज से ही प्रभावित पाए जाते हैं.

कब दवा शुरू करना जरूरी नहीं होता?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति का फास्टिंग ब्लड शुगर 126 से 140 mg/dL के बीच है और HbA1c 6.5 से 7 प्रतिशत के बीच है, तो हर स्थिति में तुरंत दवा शुरू करने की आवश्यकता नहीं होती. ऐसे मरीजों को सबसे पहले अपनी जीवनशैली में सुधार करने की सलाह दी जाती है. संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और तनाव पर नियंत्रण से कई मामलों में ब्लड शुगर को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार भोजन में दालें, हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल (सीमित मात्रा में), साबुत अनाज जैसे ज्वार, बाजरा और रागी को शामिल करना लाभकारी माना जाता है. इसके साथ ही रोजाना कम से कम 45 मिनट तक तेज चाल से चलना, योग या अन्य शारीरिक गतिविधियां करना भी जरूरी है. कई लोगों में केवल इन बदलावों से ही ब्लड शुगर सामान्य स्तर के करीब पहुंच जाता है और दवा की जरूरत टल सकती है.

कब शुरू होती है दवा?

यदि खानपान और जीवनशैली में सुधार के बावजूद ब्लड शुगर लगातार बढ़ा हुआ रहे या जांच रिपोर्ट में अपेक्षित सुधार न दिखाई दे, तब दवा शुरू करने की आवश्यकता पड़ सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि मेटफॉर्मिन टाइप-2 डायबिटीज के शुरुआती इलाज में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं में शामिल है. यदि इससे भी शुगर नियंत्रित नहीं होती, तो मरीज की उम्र, स्वास्थ्य और अन्य बीमारियों को ध्यान में रखते हुए दूसरी दवाएं या जरूरत पड़ने पर इंसुलिन भी शुरू किया जा सकता है.

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