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Health Post: समझिए महिलाओं में कब करानी पड़ती है सिजेरियन डिलीवरी और कब रहती है नॉर्मल डिलीवरी की संभावना?

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
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टीएनपी डेस्क (TNP DESK): भारत में मातृत्व और प्रसव (Childbirth) का तौर-तरीका अब तेजी से बदल रहा है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि देश में सिजेरियन (C-Section) यानी ऑपरेशन से बच्चों के जन्म का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा है. कुछ साल पहले जहां यह आंकड़ा काफी कम था, वहीं अब देश में कुल प्रसव का एक बड़ा हिस्सा ऑपरेशन के जरिए होने लगा है. खासकर निजी अस्पतालों (Private Hospitals) में तो स्थिति यह है कि आधे से ज्यादा बच्चों का जन्म सिजेरियन डिलीवरी के माध्यम से ही हो रहा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह दर अभी भी काफी कम है. आखिर क्या वजह है कि नॉर्मल डिलीवरी के मुकाबले सी-सेक्शन का क्रेज या मजबूरी इतनी बढ़ गई है? आइए विस्तार से जानते हैं.

क्यों बढ़ रहे हैं सिजेरियन डिलीवरी के मामले?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे दो मुख्य वजहें हैं, एक मेडिकल इमरजेंसी (चिकित्सकीय जरूरत) और दूसरा महिलाओं की अपनी व्यक्तिगत पसंद या लाइफस्टाइल में बदलाव. कई बार गर्भावस्था के दौरान ऐसे हालात बन जाते हैं जहां मां और बच्चे दोनों की जान बचाने के लिए ऑपरेशन करना मजबूरी बन जाता है. 

•    प्रेग्नेंसी में मां की अधिक उम्र: बढ़ती उम्र के साथ गर्भधारण करने पर कई बार जटिलताएं बढ़ जाती हैं.
•    पिछली डिलीवरी की हिस्ट्री: यदि पहली डिलीवरी भी सी-सेक्शन से हुई हो, तो दूसरी बार भी ऑपरेशन की संभावना बढ़ जाती है.
•    स्वास्थ्य समस्याएं: गर्भावस्था के दौरान गंभीर बीमारियां, बच्चे तक ऑक्सीजन की सप्लाई कम होना, या गर्भ में एम्नियोटिक फ्लूइड (Amniotic Fluid) का स्तर अचानक घट जाना.
•    खराब लाइफस्टाइल: आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, अनहेल्दी खानपान और तनाव के कारण महिलाओं में थायरॉइड, पीसीओडी (PCOD) और मोटापे जैसी समस्याएं आम हो गई हैं. इन बीमारियों से जूझ रही महिलाओं में नॉर्मल डिलीवरी के दौरान जोखिम बढ़ जाता है, जिसके चलते डॉक्टरों को मजबूरन सर्जरी का रास्ता चुनना पड़ता है.

खुद से डिलीवरी की तारीख चुन रही हैं महिलाएं?
मेडिकल कारणों के अलावा, आज के दौर में एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिल रहा है कि कई महिलाएं खुद आगे बढ़कर डॉक्टरों से सी-सेक्शन करने की मांग करती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आज की कामकाजी और आधुनिक जीवनशैली में महिलाएं प्रसव पीड़ा (Labor Pain) के लंबे दर्द और असहजता से बचना चाहती हैं. कई महिलाएं अपनी सुविधा के अनुसार डिलीवरी की एक खास तारीख (शुभ मुहूर्त या अपनी छुट्टी के हिसाब से) चुनना चाहती हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि सिजेरियन डिलीवरी एक आसान और दर्दमुक्त विकल्प है. हालांकि, डॉक्टर इस बात पर जोर देते हैं कि बिना किसी मेडिकल जरूरत के केवल अपनी सुविधा या डर के कारण सर्जरी का विकल्प चुनना हमेशा समझदारी नहीं है.

तो क्या बेहतर है: नॉर्मल या सिजेरियन?
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि डिलीवरी का तरीका कभी भी फैशन, डर या अपनी सहूलियत के आधार पर तय नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पूरी तरह मेडिकल कंडीशन पर निर्भर होना चाहिए.
•    नॉर्मल डिलीवरी के फायदे: अगर मां और बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं, तो प्राकृतिक रूप से यानी नॉर्मल डिलीवरी ही सबसे बेहतरीन मानी जाती है. इसमें अस्पताल में कम दिनों तक रहना पड़ता है, रिकवरी बहुत तेजी से होती है, और जन्म के समय प्राकृतिक प्रक्रिया से गुजरने के कारण नवजात शिशु का इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) भी अधिक मजबूत बनता है.
•    कब है सी-सेक्शन जरूरी?: यदि गर्भ में बच्चे की पोजीशन उल्टी या आड़ी (Breech Position) हो, प्लेसेंटा गर्भाशय में नीचे की तरफ खिसक आया हो, या मां को हाई ब्लड प्रेशर और गंभीर डायबिटीज जैसी समस्याएं हों, तो ऐसी स्थिति में जान जोखिम में डालने के बजाय सिजेरियन डिलीवरी ही सबसे सुरक्षित और सही विकल्प साबित होती है.

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