टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : झारखंड के सुदूरवर्ती, पहाड़ी, जंगल और दुर्गम इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार डॉक्टरों को अतिरिक्त आर्थिक प्रोत्साहन देने की तैयारी में है. सरकार का मानना है कि जिन इलाकों में भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं और डॉक्टरों के लिए लंबे समय तक सेवा देना चुनौतीपूर्ण है, वहां सामान्य व्यवस्था के मुकाबले बेहतर प्रोत्साहन देकर चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है.
प्रस्तावित व्यवस्था में हार्ड एरिया यानी कठिन क्षेत्र को चिह्नित किया जाएगा और वहां तैनात डॉक्टरों को अतिरिक्त भत्ता या अन्य सुविधाएं देने पर काम किया जा रहा है. इसके लिए राज्य के स्वास्थ्य संस्थानों की सुविधा-वार मैपिंग की जाएगी. मैपिंग में संस्थान की भौगोलिक स्थिति, दूरी, क्षेत्र की कठिनाई, मरीजों का दबाव और डॉक्टर की जिम्मेदारी जैसे पहलुओं को शामिल किया जाएगा.
4189 डॉक्टरों की जरूरत, 2659 ही तैनात
राज्य में डॉक्टरों की कमी का अंदाजा सरकारी आंकड़ों से लगाया जा सकता है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में 4189 डॉक्टरों की जरूरत बतायी गयी है. वहीं एमबीबीएस मेडिकल ऑफिसर और विशेषज्ञ डॉक्टरों के नियमित तथा एनएचएम संविदा पदों को मिलाकर 4486 पद स्वीकृत/अनुमोदित हैं.
इसके बावजूद करीब 2659 डॉक्टर ही तैनात हैं और 1311 पद रिक्त बताए गए हैं. सबसे गंभीर स्थिति विशेषज्ञ चिकित्सकों की है.
राज्य में 1416 विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत के मुकाबले 1449 पद स्वीकृत/अनुमोदित हैं, लेकिन सिर्फ 553 विशेषज्ञ डॉक्टर कार्यरत हैं. यानी विशेषज्ञ डॉक्टरों के 896 पद खाली हैं.
इसी तरह एमबीबीएस मेडिकल ऑफिसर के लिए 2773 डॉक्टरों की जरूरत बतायी गयी है. इसके मुकाबले 3037 पद स्वीकृत/अनुमोदित हैं और 2106 डॉक्टर तैनात हैं, जबकि 415 पद रिक्त हैं.
डॉक्टरों की स्थिति एक नजर में
| श्रेणी | जरूरत | स्वीकृत/अनुमोदित पद | कार्यरत | रिक्त |
|---|---|---|---|---|
| विशेषज्ञ डॉक्टर | 1,416 | 1,449 | 553 | 896 |
| MBBS मेडिकल ऑफिसर | 2,773 | 3,037 | 2,106 | 415 |
| कुल | 4,189 | 4,486 | 2,659 | 1,311 |
नोट: ये आंकड़े हाल की रिपोर्ट में स्वास्थ्य विभाग से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर प्रकाशित किए गए हैं. अलग-अलग रिपोर्टिंग अवधि या नियमित/एनएचएम पदों की गणना के तरीके के कारण आंकड़ों में अंतर संभव है.
मुश्किल इलाकों में डॉक्टरों को क्यों मिलेगा अतिरिक्त पैसा?
झारखंड की भौगोलिक स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में कई जगहों पर चुनौतीपूर्ण है. जंगल, पहाड़ी क्षेत्र, सीमावर्ती और दूरदराज के प्रखंडों में कई स्वास्थ्य संस्थान जिला मुख्यालय से काफी दूरी पर हैं.
ऐसे इलाकों में डॉक्टरों की नियुक्ति होने के बाद भी लंबे समय तक पद पर बने रहना चुनौती बना रहता है. सरकार की प्रस्तावित रणनीति का उद्देश्य इसी समस्या को आर्थिक प्रोत्साहन के जरिए कम करना है.
हार्ड एरिया की पहचान के बाद वहां तैनात चिकित्सकों को अतिरिक्त इंसेंटिव, आवास अथवा आवास संबंधी सहायता और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है. हालांकि, उपलब्ध जानकारी में अभी हर श्रेणी के क्षेत्र के लिए अतिरिक्त भत्ते की अंतिम राशि घोषित नहीं हुई है.
सिर्फ भत्ता ही नहीं, दूसरी सुविधाओं पर भी जोर
सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था में डॉक्टरों को केवल अतिरिक्त राशि देने तक सीमित नहीं रखा गया है. स्वास्थ्य संस्थानों की मैपिंग के साथ वहां काम करने वाले कर्मचारियों की योग्यता, अनुभव, जिम्मेदारी और कार्यभार का भी रिकॉर्ड तैयार करने की बात सामने आयी है.
इससे भविष्य में यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किस स्वास्थ्य केंद्र में किस स्तर के डॉक्टर की आवश्यकता है और कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले चिकित्सकों को किस प्रकार का अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए.
रिटायरमेंट की उम्र 67 से घटाकर 65 वर्ष
इसी बीच झारखंड सरकार ने गैर-शैक्षणिक चिकित्सकों की सेवानिवृत्ति आयु को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसला लिया है. 25 अगस्त 2026 को हुई कैबिनेट बैठक में डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति आयु 67 वर्ष से घटाकर 65 वर्ष करने को मंजूरी दी गयी. इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने संबंधित आदेश जारी किया.
सरकार का तर्क है कि डॉक्टरों की कमी का स्थायी समाधान केवल सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाना नहीं है. इसके लिए नई नियुक्तियों में तेजी, मेडिकल मानव संसाधन बढ़ाना और कठिन क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है.
इसका अर्थ यह भी है कि आने वाले वर्षों में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को एक साथ दो मोर्चों पर काम करना होगा—एक तरफ नए डॉक्टरों की भर्ती और दूसरी तरफ सुदूर क्षेत्रों में उनकी तैनाती को आकर्षक बनाना.
MBBS डॉक्टरों के लिए 10 साल के सेवा बांड की भी तैयारी
झारखंड में डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए सरकार की एक अन्य प्रस्तावित पहल MBBS छात्रों से 10 साल का सेवा बांड लेने से जुड़ी है.
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी मेडिकल कॉलेजों से MBBS करने वाले छात्रों को राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं से लंबे समय तक जुड़े रहने का प्रावधान तैयार किया जा रहा है. प्रस्ताव का उद्देश्य यह है कि राज्य के संसाधनों से तैयार होने वाले डॉक्टरों की सेवाओं का लाभ झारखंड के सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को मिले और उन्हें जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात किया जा सके.
हालांकि, सेवा बांड की अंतिम शर्तें और लागू होने की प्रक्रिया को सरकारी आदेश/एसओपी के स्तर पर देखना जरूरी होगा.
केंद्र की नीति में भी हार्ड एरिया इंसेंटिव का प्रावधान
दुर्गम इलाकों में डॉक्टरों की कमी केवल झारखंड की समस्या नहीं है. केंद्र सरकार भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में चिकित्सकों को प्रोत्साहित करने के लिए Hard Area Allowance जैसी व्यवस्था का उल्लेख करती है.
केंद्र के अनुसार ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों को हार्ड एरिया भत्ता दिया जा सकता है. इसके अलावा स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और एनेस्थेटिस्ट जैसे विशेषज्ञों को ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए मानदेय/प्रोत्साहन दिए जाते हैं. राज्यों को विशेषज्ञ डॉक्टरों को आकर्षित करने के लिए लचीली वेतन व्यवस्था अपनाने की भी अनुमति है.
इसलिए झारखंड की प्रस्तावित व्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर अपनायी जा रही उस रणनीति के अनुरूप है जिसमें दुर्गम इलाके में सेवा करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को अतिरिक्त आर्थिक और गैर-आर्थिक प्रोत्साहन देने पर जोर है.
राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में मानव संसाधन बड़ी चुनौती
झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार राज्य में 4,996 सरकारी स्वास्थ्य संस्थान और 16,719 बेड हैं. लेकिन स्वास्थ्य संस्थानों और मानव संसाधन का वितरण समान नहीं है.
दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों में MBBS मेडिकल ऑफिसर के 2,280 स्वीकृत पदों में 1,613 पद भरे हुए थे, यानी फिल रेट 80.7 प्रतिशत था. विशेषज्ञ डॉक्टरों का फिल रेट इससे काफी कम, 54.5 प्रतिशत था.
यानी समस्या केवल डॉक्टरों की कुल संख्या की नहीं है. विशेषज्ञ डॉक्टरों को सही जगह पर उपलब्ध कराना और ग्रामीण एवं दुर्गम क्षेत्रों में लंबे समय तक उनकी तैनाती बनाए रखना बड़ी चुनौती है.
क्या बदलेगा?
अगर हार्ड एरिया इंसेंटिव की व्यवस्था अंतिम रूप से लागू होती है, तो इसका सीधा उद्देश्य यह होगा कि डॉक्टरों के लिए दुर्गम क्षेत्र में काम करना आर्थिक रूप से अधिक आकर्षक बने.
इससे खासकर उन CHC, PHC और अन्य सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को फायदा हो सकता है जहां डॉक्टरों के पद लंबे समय से खाली हैं. लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार कितने क्षेत्रों को हार्ड एरिया घोषित करती है, कितना अतिरिक्त भत्ता देती है, भुगतान की शर्तें क्या होती हैं और डॉक्टरों की तैनाती कितने समय के लिए सुनिश्चित की जाती है.
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे प्रस्तावित/तैयार की जा रही व्यवस्था के रूप में देखना उचित होगा, न कि पूरे राज्य में लागू हो चुकी अंतिम वेतन योजना के रूप में.
निष्कर्ष
झारखंड सरकार के सामने चुनौती सिर्फ 4189 डॉक्टरों की जरूरत पूरी करने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि डॉक्टर रांची, जमशेदपुर और बड़े शहरों तक सीमित न रहें और राज्य के जंगल, पहाड़ तथा सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी नियमित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों.
नई नियुक्तियां, कठिन क्षेत्रों के लिए अतिरिक्त आर्थिक प्रोत्साहन, बेहतर आवासीय सुविधा और सेवा बांड जैसी व्यवस्थाएं इसी समस्या को हल करने की कोशिश का हिस्सा हैं. दूसरी ओर, डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति आयु 67 से घटाकर 65 वर्ष किए जाने के बाद नई नियुक्तियों की गति और भी महत्वपूर्ण हो गयी है.
यानी आने वाले समय में झारखंड की स्वास्थ्य नीति का बड़ा फोकस सिर्फ “कितने डॉक्टर हैं” पर नहीं, बल्कि “डॉक्टर कहां तैनात हैं और वहां कितने समय तक उपलब्ध रहते हैं” पर रहने वाला है.