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क्या आप भी जूझ रहे हैं एंग्जायटी और डिप्रेशन से? जानिए कब लेनी चाहिए एक्सपर्ट की मदद

Diksha Benipuri
Diksha Benipuri
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टीएनपी डेस्क (TNP DESK): आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काम का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां, आर्थिक परेशानियां और निजी जिंदगी से जुड़ी चिंताएं तनाव बढ़ा सकती हैं. समय-समय पर चिंता या उदासी महसूस करना सामान्य है, लेकिन जब ये भावनाएं लंबे समय तक बनी रहें और व्यक्ति के सामान्य जीवन को प्रभावित करने लगें, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. लगातार मानसिक दबाव कुछ लोगों में एंग्जायटी या डिप्रेशन जैसी समस्याओं से जुड़ा हो सकता है. हालांकि, हर व्यक्ति में लक्षण और उनकी गंभीरता अलग हो सकती है, इसलिए खुद से किसी बीमारी का निष्कर्ष निकालने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है.

 क्या है एंग्जायटी और इसके संकेत कैसे पहचानें?

एंग्जायटी का मतलब केवल सामान्य चिंता करना नहीं है. किसी परीक्षा, इंटरव्यू, नौकरी, आर्थिक परेशानी या किसी बड़ी घटना से पहले घबराहट होना शरीर और दिमाग की स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है. लेकिन जब चिंता जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए, बार-बार होने लगे या व्यक्ति उसे नियंत्रित न कर पाए, तब यह चिंता का विषय बन सकती है.

एंग्जायटी से गुजर रहे व्यक्ति को लगातार बेचैनी, डर या घबराहट महसूस हो सकती है. कुछ लोगों के मन में बार-बार नकारात्मक विचार आते रहते हैं और उन्हें किसी एक काम पर ध्यान लगाने में मुश्किल होती है. इसके अलावा दिल की धड़कन तेज होना, अधिक पसीना आना, हाथ-पैर कांपना, सांस लेने में परेशानी जैसा महसूस होना और नींद खराब होना जैसे शारीरिक लक्षण भी सामने आ सकते हैं. हर व्यक्ति में सभी लक्षण दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है.

डिप्रेशन सिर्फ उदासी का नाम नहीं

डिप्रेशन को अक्सर लोग सामान्य उदासी समझ लेते हैं, जबकि दोनों स्थितियों में अंतर है. किसी दुखद घटना के बाद कुछ समय तक उदास रहना स्वाभाविक हो सकता है. वहीं, डिप्रेशन में उदासी, निराशा या खालीपन की भावना लंबे समय तक बनी रह सकती है और व्यक्ति के व्यवहार व रोजमर्रा की गतिविधियों पर असर डाल सकती है.

डिप्रेशन में व्यक्ति उन कामों या गतिविधियों में भी दिलचस्पी खो सकता है, जिन्हें वह पहले पसंद करता था. लगातार थकान, ऊर्जा की कमी, नींद में बदलाव, भूख में कमी या बढ़ोतरी, ध्यान लगाने में परेशानी और खुद को लेकर नकारात्मक भावनाएं इसके संभावित संकेत हो सकते हैं. कुछ लोग सामाजिक मेलजोल से बचने लगते हैं और परिवार या दोस्तों से दूरी बनाने लगते हैं.

कब मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें?

हर चिंता या उदासी के लिए डॉक्टर के पास जाना जरूरी नहीं होता. लेकिन अगर मानसिक परेशानी लगातार बनी हुई है, समय के साथ बढ़ रही है या इसका असर पढ़ाई, नौकरी, परिवार, रिश्तों और रोजमर्रा के कामों पर पड़ रहा है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना समझदारी है.

मनोचिकित्सक, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट या योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ व्यक्ति की स्थिति को समझने में मदद कर सकते हैं. इसके बाद जरूरत के अनुसार काउंसलिंग, थेरेपी, दवा या अन्य उपचार की सलाह दी जा सकती है. इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर खुद से दवा लेना या इलाज शुरू करना सही तरीका नहीं है.

परिवार और दोस्तों का सहयोग भी जरूरी

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों में व्यक्ति के आसपास के लोगों का व्यवहार काफी मायने रखता है. अगर कोई करीबी लगातार परेशान, चुप या अलग-थलग नजर आ रहा है, तो उससे बात करने की कोशिश करें. उसकी समस्या को मजाक में उड़ाने या यह कहने के बजाय कि 'सब ठीक हो जाएगा', उसकी बात ध्यान से सुनना ज्यादा मददगार हो सकता है.

उसे बिना जज किए अपनी बात रखने का मौका देना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है. पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित दिनचर्या और सामाजिक संपर्क बनाए रखना भी मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल का हिस्सा हो सकता है.

आत्महत्या के विचार आएं तो तुरंत लें मदद

अगर किसी व्यक्ति के मन में खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या करने के विचार आ रहे हों, या उसे महसूस हो कि वह खुद को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो इसे आपात स्थिति की तरह लेना चाहिए. ऐसे व्यक्ति को अकेला न छोड़ें और तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति को इसकी जानकारी दें. साथ ही नजदीकी अस्पताल या स्थानीय आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संपर्क करें.

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी किसी व्यक्ति की कमजोरी नहीं है. जिस तरह शारीरिक बीमारी होने पर डॉक्टर से सलाह ली जाती है, उसी तरह लगातार मानसिक परेशानी होने पर विशेषज्ञ की मदद लेना भी सामान्य और जरूरी कदम है. समय पर जागरूकता, परिवार का सहयोग और सही पेशेवर मदद व्यक्ति को अपनी स्थिति समझने और बेहतर तरीके से उससे निपटने में सहायता कर सकती है.

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