दुमका (DUMKA) : दुमका के वरिष्ठ पत्रकार मृत्युंजय पांडे के साथ मारपीट के आरोपी हंसडीहा थाना प्रभारी ताराचंद को आखिरकार एसपी पीतांबर सिंह खेरवार ने निलंबित कर विभागीय कार्रवाई का आदेश दिया. देर से ही सही, लेकिन यह फैसला पुलिस की साख बचाने की मजबूरी बन गया है. इम्तिहान की घड़ी पुलिस प्रशासन के लिए भी है.
पुलिस की परिभाषा पर वर्दीवाले का तमाचा
पुलिस को पुरुषार्थी, लिप्सा रहित और सहयोगी बताया जाता है, लेकिन जब वही पुलिस भरोसे के काबिल न रहे तो जनता किस पर विश्वास करे? दुमका पुलिस का यह चेहरा न सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि कानून व्यवस्था पर सीधा हमला भी है.
CCTV में कैद गुंडागर्दी
शनिवार रात हंसडीहा चौक पर हुई घटना सीसीटीवी में कैद है. मंत्री संजय यादव की मां के श्राद्ध कर्म से लौट रहे पत्रकार मृत्युंजय पांडे और नीतेश वर्मा चाय पीने हंसडीहा चौक पर रुके थे. मामूली जाम की वजह पूछना पत्रकारों को भारी पड़ गया. अपना परिचय देना बना गुनाह हो गया. भीड़ ने न केवल बदसलूकी की, जबरन कार में बैठाने की कोशिश हुई, बल्कि दौड़ा दौड़ा कर पीटा। पत्रकारों ने खुद को मीडिया से जुड़ा बताया और वीडियो बनाने की बात कही. बस, यहीं से थाना प्रभारी ताराचंद ने अपना आपा खो गया.
सड़क पर लात घूंसे, थाने में हैवानियत की हदें की पार
आरोप है कि थाना प्रभारी ने सड़क पर ही मृत्युंजय पांडे पर लात घूंसे बरसाए। जान बचाने के लिए पत्रकार थाना भागे, लेकिन हैरानी तब हुई जब वही भीड़ थाने के अंदर तक घुस गई. अंदर जाकर खुलासा हुआ कि मारपीट करने वाले कोई और नहीं, खुद थानेदार, उनका निजी चालक और पुलिसकर्मी है. आरोप है कि थाना के अंदर कमरा बंद कर पत्रकार की बेरहमी से पिटाई की गई. यह सवाल खड़ा करता है कि क्या थाने अब न्याय के नहीं, आतंक के अड्डे बनते जा रहे हैं?
हरकत में एसपी, इसके बाबजूद कर्तव्य में इतनी देरी?
घटना की जानकारी मिलते ही एसपी ने एसडीपीओ और कई थाना प्रभारियों को हंसडीहा भेजा. रविवार को पत्रकारों ने एसपी से मिलकर निलंबन और गिरफ्तारी की मांग की. आखिरकार 29 दिसंबर की रात थानेदार निलंबित हुआ.
CCTV फुटेज होने के बावजूद कार्रवाई में देरी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल जब घटना का सीसीटीवी फुटेज मौजूद था, तब भी कार्रवाई में इतना विलंब क्यों? पत्रकारों को फौरन जेल भेजने वाली दुमका पुलिस के हाथ थानेदार पर कार्रवाई करते वक्त क्यों कांप रहे थे? वैसे सच्चाई यह भी है कि झारखंड में एक कांस्टेबल भी घंटों में इंस्पेक्टर को निलंबित करा देता है.
किसका संरक्षण? किसकी कुर्सी?
आरोपी थानेदार ताराचंद को आखिर किसका राजनीतिक संरक्षण हासिल है? बार-बार विवादों के बावजूद उन्हें एक विधान सभा विशेष के थानों की जिम्मेदारी क्यों मिलती रही? चुनाव से पहले गोड्डा जिले के पोड़ैयाहाट से ट्रांसफर होकर दुमका पहुंचे ताराचंद को पहले सरैयाहाट, फिर हंसडीहा थाना दिया गया. तीनों थाने एक ही विधानसभा क्षेत्र में आते हैं. यह महज संयोग है या साजिश?
ताराचंद का निलंबन का है लंबा इतिहास
ताराचंद का विवादों से पुराना रिश्ता है. सरैयाहाट थानेदार रहते आईजी द्वारा निलंबन, काठीकुंड थाना में जेएसआई रहते चाय दुकानदार की पिटाई पर निलंबन और अब हंसडीहा थानेदार के रूप में पत्रकार की पिटाई के आरोप में तीसरी बार निलंबन. हर बार सवाल उठा, हर बार कुर्सी मिलती रही.
वर्दी की गर्मी और सत्ता की छाया, यह रिश्ता क्या कहलाता है!
जहां जहां ताराचंद रहे, वहां की जनता उनके कारनामों से त्रस्त रही। वर्दी की गर्मी और राजनीतिक संरक्षण में ताराचंद का मनोबल बढ़ता गया. यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती. हम एक एक कर ताराचंद के कारनामों को बेनकाब करेंगे. यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि राजनीतिक संरक्षण देने वाले आका और निलंबित थानेदार के बीच का रिश्ता आखिर क्या कहलाता है?
