☰
✕
  • Jharkhand
  • Bihar
  • Politics
  • Business
  • Sports
  • National
  • Crime Post
  • Life Style
  • TNP Special Stories
  • Health Post
  • Foodly Post
  • Big Stories
  • Know your Neta ji
  • Entertainment
  • Art & Culture
  • Know Your MLA
  • Lok Sabha Chunav 2024
  • Local News
  • Tour & Travel
  • TNP Photo
  • Techno Post
  • Special Stories
  • LS Election 2024
  • covid -19
  • TNP Explainer
  • Blogs
  • Trending
  • Education & Job
  • News Update
  • Special Story
  • Religion
  1. Home
  2. /
  3. News Update

दुमका: माता पिता की बेरुखी, दादी का सहारा, तिलवरिया में तीन मासूमों से छीना गया बचपन

दुमका: माता पिता की बेरुखी, दादी का सहारा, तिलवरिया में तीन मासूमों से छीना गया बचपन

दुमका (DUMKA):  दुमका जिले के जरमुंडी प्रखंड के तिलवरिया गांव से सामने आई यह कहानी केवल तीन बच्चों की पीड़ा नहीं, बल्कि उस समाज और व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो बच्चों के अधिकार, संरक्षण और भविष्य की बड़ी-बड़ी बातें तो करता है, लेकिन हकीकत में उन्हें उनके हाल पर छोड़ देता है. 

अरमानों के नाम, बेरुखी की तकदीर

मोहन राय की शादी के बाद तीन बच्चों का जन्म हुआ. बड़े अरमान से नाम रखे गए राकेश, मनखुश और दिलखुश. लेकिन विडंबना यह कि न मां का मन खुश हुआ और न ही पिता का दिल. आज तीनों मासूम मां बाप की छांव में नहीं, बल्कि दादी प्यारी देवी की मजबूरी और संघर्ष के भरोसे जीवन काट रहे हैं.

मां ने छोड़ा घर, ममता भी छूट गई

मानवता को झकझोर देने वाला सच यह है कि सात वर्ष पहले मां कटकी देवी किसी दूसरे पुरुष के साथ तीन मासूम बच्चों और पति को छोड़कर चली गई. बच्चे यह भी नहीं समझ पाए कि मां क्यों गई और कब लौटेगी. ममता के बिना उनका बचपन उसी दिन अधूरा हो गया.

पिता भी बन गए बेगाने

चेन्नई के बहाने निकले, कर ली दूसरी शादी दर्द की कहानी यहीं खत्म नहीं होती. दो साल पहले पिता मोहन राय काम के बहाने चेन्नई गए और वहीं दूसरी शादी कर ली. लौटकर बच्चों की जिम्मेदारी उठाने की जरूरत तक महसूस नहीं की. पिता के इस फैसले ने बच्चों को जिंदा रहते अनाथ बना दिया.

जिंदा मां-बाप, फिर भी बचपन अनाथ, तीन मासूमों की जिम्मेदारी दादी के कंधों पर

मां ने साथ छोड़ा, पिता ने मुंह मोड़ा. अब टूटे खपड़े के घर में रहने वाली दादी प्यारी देवी पर तीनों बच्चों की पूरी जिम्मेदारी आ गई है. बुजुर्ग दादी खुद सहारे की मोहताज हैं, लेकिन बच्चों के लिए वही आखिरी ढाल बनी हुई हैं.

पेंशन के सहारे पल रहा भविष्य,सरकारी मदद ही एकमात्र आस

सरकार से मिलने वाली मामूली पेंशन के सहारे दादी न सिर्फ घर चला रही हैं, बल्कि तीनों बच्चों को स्कूल भेजकर उनका भविष्य संवारने की कोशिश कर रही हैं. यह पेंशन उनके लिए सहायता नहीं, बल्कि जिंदगी और शिक्षा की लड़ाई का हथियार है.

13 साल में जिम्मेदारियों का बोझ, राकेश पढ़ाई के साथ करता है काम

13 वर्षीय राकेश छठी कक्षा में पढ़ता है। वह बताता है कि शादी ब्याह के मौसम में छोटे मोटे काम कर कुछ पैसे कमा लेता है, ताकि घर चलाने में मदद हो सके. उसकी आंखों में डर साफ झलकता है. तभी तो कहता है कि दादी के भरोसे ही जिंदगी है.अगर दादी भी नहीं रहीं, तो हम क्या करेंगे?”

जिसने मां को जाना ही नहीं,दो साल की उम्र में छूटा मां का हाथ

9 वर्षीय दिलखुश, जो कक्षा दो में पढ़ता है, मां को पहचान तक नहीं पाया। दो साल की उम्र में मां का साथ छूटा और सात साल में पिता का प्यार भी खत्म हो गया। उसके बचपन में खिलौनों की जगह अब डर और असुरक्षा ने ले ली है.

शिक्षक भी बने गवाह, कहा व्यवस्था को आगे आना जरूरी

जिस स्कूल में मनखुश और दिलखुश पढ़ते हैं, वहां के शिक्षक मोहन माल कहते है कि इन बच्चों की कहानी सुनकर मन व्यथित हो जाता है. मां पिता का होना बच्चों के लिए कितना जरूरी है, यह इन्हें देखकर समझ आता है. शिक्षक ही नहीं, अभिभावक बनकर जितना हो सके करेंगे, लेकिन व्यवस्था को आगे आना चाहिए.

व्यवस्था के सामने कठोर सवाल

तीनों मासूमों की हालत कई सवाल खड़े करती है.

क्या बच्चों को छोड़ देना कोई अपराध नहीं?

क्या दूसरी शादी के बाद पिता की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?

क्या सरकारी पेंशन से तीन बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सकता है?

बाल संरक्षण इकाई और प्रशासन की नजर अब तक इस परिवार पर क्यों नहीं पड़ी?

सहानुभूति नहीं जवाबदेही चाहिए

यह खबर सहानुभूति नहीं, जवाबदेही मांगती है.

अगर आज इन बच्चों को सहारा नहीं मिला, तो कल समाज एक और टूटे हुए भविष्य का जिम्मेदार होगा.

Published at: 20 Dec 2025 02:04 PM (IST)
Tags:Jharkhand newsDumkaParents' indifferenceLife style newsDumka storyDumka latest news
  • YouTube

© Copyrights 2023 CH9 Internet Media Pvt. Ltd. All rights reserved.