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Jharkhand- पिछड़ों के आरक्षण विस्तार से राज्यपाल का इंकार, बिहार में 75 फीसदी आरक्षण तो झारखंड में 77 फीसदी पर आपत्ति? जानिये कौन है इसका गुनाहगार

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 12:05:36 AM

रांची(RANCHI)-पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण विस्तार के हेमंत सरकार के एक अहम फैसले पर राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ने मुहर लगाने से इंकार कर दिया है, सलेम कोट्टई मरियम्मन मंदिर की यात्रा पर तिरुमणिमुत्थर पहुंचे राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ने कहा है कि राज्यपाल की पहली प्राथमिकता संविधान की रक्षा करना है. यदि राज्य सरकार की ओर से उसके पास कोई ऐसा बिल भेजा जाता जो पहली नजर में संविधान के मूल्यों के खिलाफ जाता दिख रहा हो, तो उस हालत में राज्यपाल का यह कर्तव्य है कि वह उस बिल पर संविधान विशेषज्ञों और अटॉर्नी जनरल की राय ले.

आरक्षण विस्तार का फैसला सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के खिलाफ

हेमंत सरकार के द्वारा पिछडों का आरक्षण विस्तार का फैसला भी उसी श्रेणी में आता है, राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के विपरीत जाकर आरक्षण की अधिकतम सीमा को 77 फीसदी करने का फैसला लिया है, लेकिन एक राज्यपाल के रुप में हमारे लिए इस पर मुहर लगाना मुश्किल है. मुख्यमंत्री सरकार चला रहे हैं, और इस नाते वह एक बड़े सामाजिक वर्ग को खुश करने की रणनीति पर काम कर सकते हैं, और कर रहे हैं, लेकिन जहां तक संविधान की बात है तो वह किसी भी मुख्यमंत्री को चुनाव जीतने के लिए किसी भी सीमा तक जाने की अनुमति प्रदान नहीं करता. 

बिहार में 75 फीसदी आरक्षण तो 77 फीसदी आरक्षण पर सीपी राधाकृष्णन को आपत्ति क्यों?

यहां याद रहे कि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने पिछड़ी अतिपिछड़ी जातियों को 43 फीसदी आरक्षण प्रदान करने का निर्णय लिया, राज्य सरकार के इस फैसले के साथ ही बिहार में आरक्षण की अधिकतम सीमा 75 फीसदी तक पहुंच गयी. बावजूद इसके विधान सभा में राज्य सरकार के इस फैसले पर सभी दलों ने अपनी मुहर लगायी, वहीं राज्यपाल ने भी बिना देरी इस बिल को अपना मंजूरी प्रदान कर दिया. इस हालत में अब सवाल खड़ा होता है कि यदि बिहार 75 फीसदी का आरक्षण प्रदान कर सकता है, और राज्यपाल बिना देरी इस पर अपनी मुहर लगा सकते हैं तो झारखंड में सीपी राधाकृष्णन इस पर कैंची क्यों चलानी पड़ रही है? तो इसका जवाब यह है कि नीतीश कुमार ने आरक्षण विस्तार के पहले जातीय जनगणना का आंकड़ा एकत्रित कर इसके पक्ष में ठोस आधार पेश किया था, जबकि हेमंत सरकार के इस फैसले के पीछे कोई वैज्ञानिक और तर्कसंगत आंकड़ा नहीं है, यदि हेमंत सरकार ने भी नीतीश कुमार की राह पर चलते हुए जातीय जनगणना को पहले पूरा करवा लिया होता तो आज इस फैसले पर राज्यपाल की कैंची नहीं  चली होती, क्योंकि तब राज्यपाल के समक्ष पिछड़ों के आरक्षण विस्तार के पक्ष में एक आंकड़ागत तर्क होता.

 तो क्या जातीय जनगणना करवाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है हेमंत सरकार

तो क्या माना जाय कि हेमंत सरकार अब भी झारखंड में जातीय जनगणना की घोषणा करेगी, क्योंकि नीतीश कुमार ने इस मामले में कानूनी जंग जीत कर बहुत हद तक रास्ता साफ कर दिया है, क्योंकि यदि हेमंत सरकार जाति आधारित जनगणना पर आगे बढ़ते हुए इसकी घोषणा करती है, और इस गणना की शुरुआत करती है, और यदि उसके बाद कोई कोर्ट जाता है, या केन्द्र सरकार इसमें बाधा खड़ी करती है, तो वह कोर्ट में बिहार में जातीय जनगणना के मामले में पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सामने रख सकती है, और उसी आधार  पर झारखंड के लिए भी जातीय जनगणना की मांग कर सकती है, और यदि हेमंत सरकार ऐसा नहीं कर इसे सिर्फ केन्द्र सरकार के खिलाफ अपनी लड़ाई के लिए एक टूल के रुप में इस्तेमाल करती है तो निश्चित रुप से पिछड़ी जातियों में इसका नकारात्मक संदेश जायेगा और इसके साथ ही भाजपा भी इसे एक चुनावी  मुद्दा बनाने से पीछे नहीं रहेगी. अब देखना होगा कि हेमंत सरकार क्या फैसला लेती है.  लेकिन इतना निश्चित है कि झारखंड मे यह विवाद अब तूल पकड़ने वाला है. और इसका नुकसान हेमंत सरकार को भी भुगतना पड़ सकता है.

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