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नीतीश के तीर के हिलने लगी योगी आदित्यनाथ की कुर्सी, 3 दिसम्बर के बाद पीएम मोदी ले सकते हैं बड़ा फैसला

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 15, 2026, 5:14:38 PM

TNP DESK-राजनीति परसेप्शन का खेल है, परसेप्शन की कामयाबी ही सियासतदानों की राजनीतिक विसात तय करती है, जमीनी हकीकत चाहे जो कुछ हो, लेकिन यदि परसेप्शन चल निकला तो तीर निशाने लगता है और फिलवक्त सीएम नीतीश का जातीय जनगणना और पिछड़ों के आरक्षण विस्तार का तीर सीधे सीधे सीएम योगी की बुनियाद हिलाता दिख रहा है. इसकी झलक दिल्ली से लेकर यूपी तक की सियासी गलियारों में चल रही चर्चांओं में देखने को मिल रहा है.

किस  बात से नाराज चल रहे हैं केशव प्रसाद मौर्या 

एक तरफ केशव प्रसाद मौर्या रहस्यमय ढंग से चुप्प नजर आ रहे हैं, चाहे अयोध्या आरती हो या दूसरे प्रमुख सरकारी आयोजन, वह इन कार्यक्रमों से  लगातार अपनी दूरी बनाये हुए है, उनकी इस नाराजगी की एक बड़ी वजह सीएम की वह कुर्सी बतायी जा रही है, जो 2017 में उनके चेहरे को सामने रख कर फतह किया गया था

पीएम मोदी का चेहरा अब जीत की गारंटी नहीं

यहां याद रहे कि कल्याण सिंह के बगावत के बाद यूपी का यह किला करीबन 13 वर्षों तक भाजपा के लिए अभेद बना रहा और भाजपा इस किले तो भेदने में तब ही सफल हो पायी, जब उसने केशव प्रसाद मौर्या और स्वतंत्र देव सिंह जैसे पिछड़ों चेहरों को सामने रखा, लेकिन सत्ता आते ही इन तमाम चेहरों को दरकिनार कर योगी आदित्यनाथ  को सीएम की कुर्सी पर विराजमान करा दिया गया. क्योंकि तब यह आकलन किया गया था कि पीएम मोदी के पिछड़े चेहरे के सामने दूसरे सभी पिछड़े चेहरे नेपथ्य में चले जायेंगे, लेकिन इन दस वर्षों में गंगा में काफी पानी गया, अब पीएम मोदी का चेहरा जीत की गारंटी नहीं रही, हिमाचल, कर्नाटक, बंगाल, बिहार, झारखंड, तेलांगना, समेत दर्जनों ऐसे राज्य दर राज्य हैं, जहां पीएम मोदी का आक्रमक प्रचार का कोई खास असर नहीं हुआ, इसके पहले भी राजस्थान, कर्नाटक, मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ में उनका जलबा नहीं चला था, और इन तमाम राज्यों में कांग्रेस सत्ता पाने में सफल रही थी, हालांकि तब भाजपा ने कर्नाटक और मध्यप्रदेश में तोड़ जोड़ कर किसी प्रकार सत्ता में वापसी कर लिया था. लेकिन सत्ता में एन-केन-प्रकारेण वापसी करने की वही ललक, अब भाजपा के लिए नुकसानदायक बनता दिखने लगा है.

पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में पीछे चल रही है भाजपा

हालिया पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के लिए हो रहे तमाम सर्वेक्षणों में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापसी दिखलायी जा रही है, और जिस राजस्थान के बारे खुद राहुल गांधी कांग्रेस को कमतर आंक रहे थें, दावा किया जा रहा कि हर बितते दिन के साथ कांग्रेस अपनी दावेदारी मजबूत करती नजर आ रही है, और आश्यर्च नहीं हो कि तीन दिसम्बर को जो चुनाव परिणाम आये, उसमें या तो कांग्रेस की वापसी हो जाय, या त्रिशंकु विधान सभा की स्थिति कायम हो जाय.

मध्यप्रदेश की सत्ता गंवाने के बाद भाजपा के पास नहीं होगा कोई पिछड़ा सीएम 

और यदि मध्यप्रदेश के साथ भाजपा के हाथ से राजस्थान की सत्ता भी जाती है तो यह 2024 के महामुकाबले एक बड़ा सदमा होगा. लेकिन सवाल यह है कि राजस्थान की हार से सीएम योगी का किया रिश्ता है, तो उसके कुछ कारण है. क्योंकि मध्यप्रदेश गंवाते ही भाजपा के हाथ से वह एकमात्र प्रदेश भी निकल जायेगा, जहां आज के दिन कोई पिछड़ा चेहरा है, यानि उसके बाद किसी भी भाजपा शासित राज्य में कोई पिछड़ा चेहरा नहीं रहेगा, सारे के सारे सीएम सवर्ण जातियों के होंगे.

जातीय जनगणना और पिछड़ा कार्ड खेलकर सीएम नीतीश ने राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ाया अपना कद

यह स्थिति नीतीश कुमार के जातीय जनगणना और पिछड़ों का आरक्षण विस्तार के कार्ड के पहले तक कोई मुद्दा नहीं था, लेकिन नीतीश के इस तीर से पूरे देश में जातीय जनगणना की मांग बलवती हो गयी है, इधर राहुल गांधी राज्य दर राज्य इस बात की गारंटी प्रदान करते जा रहे हैं कि जैसे ही उनकी सरकार बनती है, कांग्रेस सबसे पहले जातीय जनगणना करवायेगी, कांशी राम का लोकप्रिय नारा जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी आज बसपा के हाथ से निकल कांग्रेस का नारा बन चुका है, पीएम मोदी यों ही राहुल गांधी को मुर्खों को सरदार नहीं बता रहे हैं, बल्कि इस नारे से भाजपा की जो जमीन हिल रही है, यह उसकी खिसियाहट है. भाजपा के रणनीतिकारों को इस नारे की जमीनी हकीकत पत्ता है. और यही उनकी बेचैनी का कारण है, और इसी का काट यूपी में खोजने की कोशिश की जा रही है.

भाजपा के लिए खतरा दो तरफा है

भाजपा के लिए खतरा दो तरफा है, एक तरफ राहुल गांधी जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का सवाल खड़ा कर मुसिबत पैदा कर रहे हैं, दूसरी तरह सीएम नीतीश, जिनका चेहरा जातीय जनगणना और पिछड़ों का आरक्षण विस्तार के बाद अचानक राष्ट्रीय फलक तक उठ खड़ा हुआ है, आज उन्हे देश में पिछड़ो का सबसे बड़ा चेहरा माना जा रहा है. वह खुद यूपी के फूलपुर लोकसभा सीट से 2024 के चुनावी दंगल में उतरने का मन बना रहे हैं. आज भाजपा के साथ खड़ा अनुप्रिया पटेल हो या दूसरे पिछड़े चेहरे सबों से सीएम नीतीश का संवाद जारी है.

यूपी में सात फीसदी से अधिक आबादी है कुर्मियों की

ध्यान रहे कि फूलपुर लोकसभा और उसकी निकटवर्ती संसदीय सीटों में कुर्मी जाति की बहुलता है. इसके साथ ही यूपी में कुर्मियों की आबादी करीबन 7 फीसदी मानी जाती है, नीतीश की  नजर  दूसरी पिछड़ी जातियों के साथ ही कुर्मी जाति की इस सात फीसदी मतों को अपने साथ खड़ा करने की है, और यह कोई दूर की कौड़ी नहीं है. और ऐसा नहीं है कि अमित शाह और मोदी की जोड़ी सीएम नीतीश की इस चाल से अनजान है, उन्हे इसका संभावित हश्र क्या होगा इसकी पूरी जानकारी है, और उधर अनुप्रिया पटेल से लेकर दूसरे पिछड़े नेता भी सीएम नीतीश की इस चाल पर नजर बनाये हुए हैं. और नीतीश की इस चाल ने उनके अन्दर की बार्गेनिंग कैपेसिटी को और भी मजबूत कर दिया है. और मौके की नजाकत को भांपते हुए वह लगातार भाजपा के उपर अधिक से अधिक हिस्सेदारी का दवाब बनाये हुए हैं.

अमित शाह के बेहद करीब माने जाते हैं केशव प्रसाद मौर्या

लेकिन इसमें एक किरदार केशव प्रसाद मौर्य की भूमिका कुछ अलग है. हालांकि उन्हे भी इस बात का इल्म है कि अवसर उनके सामने खड़ा है, लेकिन उनकी एक दूसरी भूमिका भी है, केशव प्रसाद मौर्य अमित शाह के बेहद करीबी माने जाते हैं. और यह जगजाहीर है कि सीएम के रुप में योगी आदित्यनाथ पीएम मोदी और अमित शाह की पहली पसंद नहीं थें, बहुत ही मन मारकर आरएसएस के दवाब में उन्होंने सीएम योगी के चेहरे को स्वीकार किया था, हालांकि उनकी पसंद केशव प्रसाद मौर्या थें या नहीं, यह एक गंभीर सवाल है, जिसकी कोई उत्तर आज किसी के पास नहीं है.

शिवराज सिंह की विदाई के साथ ही हिलने लगेगी योगी आदित्यनाथ की कुर्सी

अब याद आते हैं उस समीकरण पर, और इस बात को समझने की कोशिश करते हैं कि भाजपा के द्वारा राजस्थान की सत्ता गंवाने के बाद कैसे सीएम योगी की कुर्सी पर संकट मंडरा सकता है, जैसा की पहले कहा गया है कि शिवराज सिंह चौहान के छोड़कर आज की तारीख में भाजपा के पास कोई पिछड़ा सीएम नहीं है. और तमाम सर्वेक्षणों में भाजपा के हाथ से मध्य प्रदेश जाती हुई दिखलाई जा रही है. बावजूद इसके यदि वह राजस्थान की सत्ता बचाने में कामयाब हो जाती है, तो उसके लिए राजस्थान की बागडोर किसी पिछड़े को देने का विकल्प मौजूद होगा, लेकिन यदि राजस्थान की सत्ता भी चली जाती है, तो बचता है सिर्फ यूपी, और भाजपा के लिए यह सियासी मजबूरी होगी कि वह वहां किसी पिछड़े चेहरे को सीएम बना कर सीएम नीतीश के तीर का मुकाबला करें.

पीएम मोदी के लिए आसान नहीं होगा योगी आदित्यनाथ की विदाई का पटकथा लिखना

लेकिन क्या पीएम मोदी और अमित शाह के लिए सीएम योगी की विदाई की पटकथा लिखना इतना आसान होगा? इस बात को समझने के लिए इस हकीकत को भी सामने रखा होगा कि आज की तारीख में विधान सभा के अन्दर सीएम योगी के समर्थक विधायकों की संख्या अगुंलियों पर गिनी जा सकती है, लेकिन उनके पीछे काफी हद तक आज भी आरएसएस खड़ा है, यदि बात हम यूपी में योगी की छवि  की करें तो उनकी छवि एक ठाकुर नेता की बन चुकी है. जहां उपर से नीचे तक एक खास जाति के पदाधिकारियों का पदास्थापना किया गया है, लेकिन यूपी की राजनीति  के बाहर सीएम योगी की छवि एक हिन्दू नेता के बतौर स्थापित करने की कोशिश की गयी है.

योगी की विदाई से राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को  हो सकता है नुकसान

इस हालत में देखें तो यूपी की सियासत से सीएम योगी की विदाई के भाजपा को कोई खास नुकसान नहीं होगा, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका गलत मैसेज जा सकता है, यही कारण है कि आज के दिन भाजपा के अन्दर सीएम योगी की विदाई से होने वाला नुकसान और लाभ दोनों पर गहन मंथन किया जा रहा है. और सीएम योगी को भी किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा गया है, लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि योगी आदित्यनाथ के साथ किसी भी प्रकार का कोई छेड़ छाड़ किया जाता है, तो वह भी कल्याण सिंह की तरह बगावत की राह पकड़ सकते हैं, और इसका परिणाम दूरगामी होगा. यही भाजपा की उलक्षण और सीएम योगी की ताकत है. लेकिन इतना निश्चित है कि सीएम नीतीश के तीर से आज पूरा भाजपा हलकान और हैरान हैं. और इधर सीएम नीतीश अपने यौन शिक्षा ज्ञान या प्रवचन के बाद मौनी बाबा का रुप ग्रहण कर तीन दिसम्बर का इंतजार कर रहे हैं.

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