अब बुढ़ापे में बच्चे आपको नहीं कर सकते बेघर, जानिए उच्च न्यायलय का नया फैसला


टीएनपी डेस्क (TNP DESK): बाग़बान फिल्म तो हम सबने देखी है. यह कहानी भले की फिल्म के रूप में पेश की गई थी पर देश के कई घरों की यही हकीकत है. फिल्म में दर्शाया गया है की कैसे जो मां-बाप जीवन भर की पूंजी अपने बच्चों का भविष्य बनाने में लगा देते हैं, उन्हीं मां-बाप को बच्चे जरूरत खत्म होने पर अपने पास रखने से भी कतराते हैं. जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को खून पसीने से सींचा होता है वहीं मां-बाप आगे चलकर बच्चों के लिए बोझ बन जाते हैं. हैरान करने वाली बात यह है कि यह कोई फिल्मी कहानी नहीं बल्कि देश के कई घरों की हकीकत है. .
इसी कड़ी में झारखंड हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि बुजुर्ग माता-पिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, तो उनके स्वयं की कमाई से बने मकान में बेटा और बहू जबरन नहीं रह सकते. कोर्ट ने यह भी कहा कि उत्तराधिकार का अधिकार भविष्य से जुड़ा होता है, इससे संपत्ति पर तत्काल स्वामित्व नहीं मिल जाता.
न्यायमूर्ति राजेश कुमार की पीठ ने रामगढ़ उपायुक्त द्वारा 23 फरवरी 2024 को पारित आदेश को निरस्त करते हुए बुजुर्ग दंपति की याचिका स्वीकार कर ली. अदालत ने माना कि संबंधित मकान वरिष्ठ नागरिकों की स्व-अर्जित संपत्ति है, इसलिए उस पर उनका पूर्ण अधिकार है. ऐसे में यदि उनके साथ दुर्व्यवहार होता है और साथ रहना संभव नहीं रह जाता, तो संपत्ति पर उनका शांतिपूर्ण कब्जा सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन देना है. यदि परिवार के सदस्य ही उनके लिए परेशानी का कारण बन जाएं, तो प्रशासन और न्यायालय का दायित्व है कि उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाए. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन के अंतिम पड़ाव में वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान, सुरक्षा और मानसिक शांति मिलना उनका अधिकार है.
क्या था मामला?
रामगढ़ जिले के निवासी 75 वर्षीय लखन लाल पोद्दार और उनकी 72 वर्षीय पत्नी उमा रानी पोद्दार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. दंपति का आरोप था कि उनका बेटा जीतेन्द्र पोद्दार और बहू रितु पोद्दार उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं और उन्हें अपने ही घर में चैन से नहीं रहने देते.
बताया गया कि वर्ष 2022 में दंपति ने मेंटेनेंस अधिनियम के तहत अनुमंडल पदाधिकारी (SDM) के समक्ष आवेदन दिया था. 23 नवंबर 2022 को SDM ने आदेश दिया था कि बेटा और बहू मकान खाली करें. हालांकि, इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई, जिसके बाद रामगढ़ उपायुक्त ने 23 फरवरी 2024 को SDM के आदेश में बदलाव करते हुए बेटे-बहू के पक्ष में निर्णय दे दिया.
उपायुक्त के इस आदेश को चुनौती देते हुए बुजुर्ग दंपति ने फिर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की. सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने उपायुक्त का आदेश रद्द कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि स्व-अर्जित संपत्ति पर वरिष्ठ नागरिकों का अधिकार सर्वोपरि है. इस फैसले को बुजुर्गों के अधिकारों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.
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