नक्सलियों को ज़ोनल कमांडर से कमांडर बनाने वाली सेंट्रल कमेटी क्या है, जानिए कितना है खतरनाक
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TNP DESK: नक्सल देश के पूर्वी भाग में कई दहशकों से हथियार के दम पर अपनी व्यवस्था चलाने की लड़ाई लड़ रहा है.इस लड़ाई में सुरक्षा बल के जवान और नक्सलियों के बीच कई मुठभेड़ हुई. जिसमें हजारों जान दोनों तरफ गई. लेकिन इस बीच सवालों के घेरे में सेंट्रल कमिटी होती है. जबकि सीधी लड़ाई इस कमिटी के लोग नहीं लड़ते. जंगल में ज़ोनल कमांडर और कमांडर या बटालियन आगे रहती है. ऐसे में आज बात इसी कमिटी की करेंगे. यह कौन लोग है जो पीछे रह कर भी सामने हिट लिस्ट में है और इनकी भूमिका क्या होती है.
सबसे पहले बात नक्सलवाद की कर लेते है. पश्चिमी बंगाल के नक्सलबाड़ी से निकले नक्सली एक लाल गलियारा बना कर बंगाल,झारखंड,छत्तीसगढ़ तक पहुंचे और कई दशकों से हथियार के दम पर अपनी मांग पूरी कराने की लड़ाई लड़ रहे है. लोक तंत्र वाले देश में भी इनकी जंगल अपने ही लोगों से जारी है. जिसमें इस जंग में बीते 25 साल में PIB के मुताबिक 10 हजार से अधिक लोगों की जान गई. जिसमें सुरक्षा बल के जवान,आम नागरिक और नक्सली शामिल है. हर मुठभेड़ और बड़े वारदात के बाद सेंट्रल कमिटी का नाम सामने आता है.
जबकि मुठभेड़ में वह मौजदू नहीं रहते है.जंगल में युद्ध स्थल पर ज़ोनल कमिटी सदस्य या सब ज़ोनल कमांडर मौजदू रहते है. और इसी सब ज़ोनल को ज़ोनल कमांडर में प्रमोशन सेंट्रल कमिटी के सदस्य देते है. और फिर ये कमांडर जंगल में अपनी व्यवस्था चलाने का काम करते है. इन्हे वह सब सामान मिलता है जिसकी जरूरत होती है. हथियार से लेकर गोला बारूद और खाने पीने के सामान भी दिए जाते है. इनका काम बस वारदात को अंजाम देने पर होता है. अब सवाल यही से फिर शुरू हुआ की सामान और गोला बारूद कैसे पहुंचता है पैसा कौन देता है.
बस इसी जगह सेंट्रल कमिटी का शुरू होता है. अब जान लेते है कि सेंट्रल कमिटी क्या होती है और इस कमिटी का पूरा काम क्या होता है.इसमें कौन लोग शामिल रहते है. माना जाता है कि माओवादियों की सेंट्रल कमिटी में सभी राज्य के बड़े माओवादी कैडर को शामिल किया जाता है. यह उस राज्य में संगठन को कैसे बढ़ाना है. पैसे और हथियार कहां से बटालियन को मुहैया होगा और कैसे घातक हमला कर बड़ा धमाका किया जाए. इसकी रणनीति तय करते है. इस सेंट्रल कमिटी से ऊपर एक और पोलित ब्योरों भी होते है. जिन्हे दो से तीन राज्यों की जिम्मेवारी दी जाती है.
यही वजह है कि सुरक्षा बल के जवानों का सीधा टारगेट अब सेंट्रल कमिटी सदस्य है. इसमें झारखंड से पोलित ब्योरों मिसिर बेसरा,सेंट्रल कमिटी सदस्य अनल दा और असीम मण्डल शामिल है. जिनकी तलाश सुरक्षा बल के जवान कर रहे है. अगर इनका सफाया हुआ तो नक्सल खुद खत्म हो जाएगा. माना जाता है कि नक्सलियों का नेतृत्व सेंट्रल कमिटी के सदस्य ही करते है. जब नेतृत्व ही नहीं बचेगा तो फिर संगठन खुद निस्त नाबूद हो जाएगा.
इस टारगेट पर सुरक्षा बल के जवानों को कामयाबी भी मिली है. जब सीधा टारगेट सेंट्रल कमिटी को किया गया. जिसमें हिडमा,बरास देवा जैसे कई नेतृत्वकर्ता को मार गिराया या फिर बड़े माओवादियों पर दबाव बना कर हथियार डलवा दिया. अब एक नई सुबह की उम्मीद है जब नक्सल खत्म हो जाएगा और ग्रामीण इलाके में खुशहाली दिखेगी. 31 मार्च 2026 तक नक्सल खात्मे की तारीख तय की गई है.
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