देश का एक शहर ऐसा भी ! जहां लगता है दुल्हों का बाजार, बेटियों के लिए खरीद जाते हैं दामाद, पढ़िए कहां होता है ऐसा ? 

    देश का एक शहर ऐसा भी ! जहां लगता है दुल्हों का बाजार, बेटियों के लिए खरीद जाते हैं दामाद, पढ़िए कहां होता है ऐसा ? 

     टीएनपी डेस्क (Tnp Desk):- आज ऑनलाइन का जमाना आ गया है, शादी के लिए मेट्रिमोनियल साइट, डेटिंग एप्स औऱ सोशल मीडिया में तमाम साधन लोगों को शादी-विवाह में मददगार बन रही हैं. जीवनसाथी चुनने का एक बहुत बड़ा जरिया यह बनता जा रहा है, हलांकि यहां भरोसा भी टूटते हैं और लूट भी लोग जाते हैं. क्योंकि इस तरक्की के साथ एक अंजान और बिन बुलाए दर्द भी लोगो कों मिला है. बेशक आज जमाना बदल गया है, लेकिन आज भी रिश्ता तय करना एक झंझट की तरह ही है. सही जोड़े का मिलन मुश्किल भरा बन रहा है. मतलब साफ है कि बेटे-बेटी की शादी आज भी एक मां-बाप के लिए मुश्किल भरी ही होती, क्योंकि सही रिश्ता मिलना आसान नहीं होता.

    कहां लगता है दुल्हा बाजार ?

    अगर आप थोड़ा पीछे मुड़कर देखे तो शादियां पहले रिश्तेदारों औऱ नातों के जरिए हुआ करती थी. पंडित जी रिश्ता बताते थे. लेकिन, आप चौक जाइएगा कि आज आधुनिकता के जमाने में भी दुल्हों का बाजार लगता है. जहां की मंडी में बेटियों के लिए दामाद खरीदा जाता है. यह देश का इकलौता शहर है, जहां यह पुरातन परंपरा आज भी जिंदा होकर सांस ले रही है. इतना ही नहीं आपको मनपसंद लड़की चाहिए तो भी आप इस दूल्हा बाजार में आ सकते हैं. सवाल ये है कि आखिर कौन स शहर है, जहां दुल्हा बाजार आज भी सजता है. जो वाकई किसी के लिए भी हैरान करने और चौकाने वाला है. तो चलिए आपको बताता दूं कि यह दुल्हा बाजार बिहार के मधुबनी जिले में सौरथ सभा नाम की जगह पर सजती है. यहां बेटा बिकता है और लड़की वाले इस पर बोली लगाते हैं. 

    जून-जुलाई में लगता है बाजार 

    सौरथ सभा बाज़ार में बिकने वाले दूल्हे की एक निश्चित दर होती है. जून-जुलाई के महीने में ये बाज़ार लगता है. सौरथ सभा दूल्हा बाज़ार में, लड़के की पढ़ाई, परिवार, कमाई, कुंडली देखकर लड़की वाले खरीदते हैं. मधुबनी के इस मार्केट में योग्य लड़के और लड़कियाँ ही आती है. 
    भारत में पहले दूल्हा-दुल्हन के लिए ऑनलाइन साइट्स नहीं हुआ करती थी. दूल्हा-दुल्हन ढूंढना बहुत मुश्किल काम होता था. लड़कियों के घरवाले दूर-दूर जाकर लड़के ढूंढते-फिरते थे. ऐसे लोगों के लिए ही यहां दूल्हा बाज़ार शुरू हुआ था. दरअसल यह कोई रिवाज नहीं है, बल्कि यह 700 साल पुरानी परंपरा के तहत ऐसा किया जा रहा है. 

    सब जाति के लिए है खुला 
     
    ऐसा कहा जाता है कि मैथिल ब्राह्मण और कायस्थों ने इसे शुरु किया था. पहले इस बाजार में गुरुकुल से लड़कों को लाया जाता था. जहां लड़कियों के माता-पिता अपनी बेटियों के लिए दूल्हे चुनते थे. पहले ब्राह्मण बिरादरी और कायस्थों के लिए ही ये बाज़ार था, अब सबके लिए यह खुला है. यहा  लड़की के परिजन लड़के के परिवार की पूरी जाँच-पड़ताल के बाद ही शादी तय करते हैं.यहां सबकुछ काफी जांच-परख के बाद ही रिश्ता तय होता है. यहां  लड़के के स्कूल के सर्टिफिकेट से लेकर जाति प्रमाण पत्र तक सब कुछ देना होता है. लड़की और लड़के का गोत्र मिल जाए तो माता-पिता शादी के लिए तैयार हो जाते हैं.


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