महात्मा गांधी के नाम पर बने संस्थान की पत्रिका ने छापा वीर सावरकर पर विशेष अंक, जानिये किसने क्या कहा

    महात्मा गांधी के नाम पर बने संस्थान की पत्रिका ने छापा वीर सावरकर पर विशेष अंक, जानिये किसने क्या कहा

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK): "भारत की स्वतंत्रता में वीर सावरकर का योगदान अमूल्य रहा है. उन्होंने देश के भीतर और बाहर रहते हुए आज़ादी के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों को चलाया. उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान छेड़कर, ब्रिटिश सरकार की नाक में दम कर दिया. कई बार उन्हें पकड़ने की नाकाम कोशिशें हुईं. लेकिन वे हर बार सरकार को चकमा दे जाते. सावरकर को घबराकर अंग्रेज़ी सरकार ने 1910 में आजीवन कारावास की सज़ा दी और फिर 1911 में दोबारा आजीवन कारावास दिया गया. विश्व इतिहास में ये पहली घटना है जब किसी को दो-दो बार आजीवन कारावास की सज़ा दी गई हो……, "सावरकर का इतिहास में स्थान और स्वतंत्रता आंदोलन में उनका सम्मान महात्मा गांधी से कम नहीं है." ये बातें विजय गोयल ने लिखी हैं.

    समिति के उपाध्यक्ष है भाजपा नेता विजय गोयल

    भाजपा के दिल्ली अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रहे विजय गोयल गांधी स्मृति दर्शन समिति के उपाध्यक्ष हैं. और उन्होंने उक्त बातें समिति की पत्रिका अंतिम जन में लिखी हैं. पत्रिका ने विनायक दामोदर सावरकर पर विशेष अंक प्रकाशित किया है. जिसमें गोयल ने आगे लिखा है, "ये देखकर दुख होता है कि जिन लोगों ने एक दिन जेल नहीं काटी, यातनाएँ नहीं सहीं, देश-समाज के लिए कुछ कार्य नहीं किया, वे सावरकर जैसे बलिदानी की आलोचना करते हैं."

    अंक में कुल 12 लेख शामिल

    इस खास अंक में वीर सावरकर के जीवन और दर्शन पर कुल 12 लेख शामिल किये गए हें। इनमें "एक चिंगारी थे सावरकर", "गांधी और सावरकर का संबंध", "वीर सावरकर और महात्मा गांधी", "देश भक्त सावरकर" आदि प्रमुख आलेख है. पत्रिका में डॉ. कन्हैया त्रिपाठी का भी लेख छपा है. उनका कहना है कि गांधी और सावरकर दो ध्रुव नहीं हैं. दोनों का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रवाद था और दोनों राष्ट्र की ही लड़ाई लड़ रहे थे."

    क्या बोले गांधी के प्रपौत्र

    इधर, पत्रिका को सावरकर पर केंद्रित करने पर कई लोगों ने एतराज़ जताया है. इनमें प्रमुख हैं, महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी. उनका कहना है कि ये बेहद अफ़सोस की बात है कि जिनका नाम गांधी जी की हत्या की साज़िश में आया हो, उन्हीं का महिमा मंडन किया जा रहा है." बता दें कि गांधी की हत्या के बाद वीर सावरकर को हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में मुंबई से गिरफ़्तार किया गया था. हालाँकि फ़रवरी 1949 में उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी भी कर दिया गया था.

     

     


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