पांच लाख नौकरियों का वादा: अब रोजगार मांगते छात्रों पर बरसानी पड़ रही है लाठियां, देखिये क्या हुआ

    पांच लाख नौकरियों का वादा: अब रोजगार मांगते छात्रों पर बरसानी पड़ रही है लाठियां, देखिये क्या हुआ

    रांची- नियोजन और स्थानीय नीति के विरुद्ध छात्रों का गुस्सा थमता नहीं दिख रहा है, नियोजन और स्थानीय नीति को लेकर जारी उहापोह और भ्रम के बीच छात्रों ने विधान सभा के बाहर घेराव की घोषणा की थी. छात्रों की ओर से प्रशासन को इसकी पूर्व सूचना भी दी गयी थी, इस सूचना के आधार पर प्रशासनिक महकमा अपनी तैयारियों में जुटा था, चारों तरह बैरिकेटिंग की गयी थी, कई स्थानों पर ट्रेन्च खोद कर पूरे विधान सभा को एक किले तब्दील किया गया था.
    प्रशासन की सारी तैयारियां धरी रह गयी

    लेकिन जब छात्रों ने विधान सभा की ओर कूच किया तो प्रशासन की सारी तैयारियां धरी की धरी रह गयी. आक्रोशित छात्रों ने प्रशासन की सारी किलेबंदी को एक बारगी ध्वस्त कर दिया. सारी व्यूह रचना बिखर गयी, अन्ततोगत्वा पुलिस को आक्रोशित  छात्रों पर लाठीचार्ज करना पड़ा. आसूं गैस के गोले भी छोड़ने की नौबत आ पड़ी.

    टूट रहा है छात्रों का धैर्य
    दरअसल छात्रों महज रोजगार की मांग कर रहे हैं, उनका आरोप है कि पांच लाख नौकरियों के वादे के साथ सत्ता में आयी हेमंत सरकार हर दिन अपना समय पार कर रही है, सत्ता के तीन वर्ष गुजर गये, लेकिन सरकार अभी भी नियोजन नीति और स्थानीय नीति पर ही अटकी हुई है, जबकि उनका दावा तो पांच लाख नौकरियों प्रतिवर्ष देने का था.

    60:40 फार्मूला की बात सुन छात्रों में बवाल

    छात्रों का गुस्सा इस खबर से ही भी है कि सरकार के द्वारा जिस नियोजन नीति को लाने की तैयारी की जा रही है, उसमें 60:40 का फार्मूला है, यानी कूल नौकरियों में से 60 फीसदी नौकरी स्थानीय निवासियों, जबकि 40 फीसदी नौकरियां खुला रखी जायेगी, यानी इन 40 फीसदी नौकरियों को लिए कोई भी आवदेन कर सकता है, छात्र इस नीति को बदलने की मांग कर रहे हैं.

     छात्रों की चिंताओं और गुस्से को समझने की कोशिश करे

    रोजगार की मांग करते इन छात्रों को लाठी हांक कर भागने के लिए मजबूर करना तो बेहद आसान है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि छात्रों में व्याप्त इस गुस्सा को शांत कैसे किया जायेगा. याद रहे कि ये वही छात्र हैं, जिनके द्वारा कभी “हेमंत हैं तो हिम्मत है” का नारा लगाया जाता था, आज जब इन छात्रों को यह महसूस हुआ है कि रोजगार के मोर्चे पर यह सरकार असरदार नहीं है तो वे विरोध पर उतारु हैं, उनका आक्रोश सड़कों पर उमड़ रहा है, सवाल इन पर  लाठी भाजंने का नहीं इनकी समस्यायों को दूर करने का है, शायद सरकार संवेदनशील तरीके से इन छात्रों की मांग को सुने और उनकी समस्याओं और चिंताओं समझने की कोशिश करे.


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