मुजफ्फरपुर: देश प्रसिद्ध इस्लामपुर का लहठी मंडी हुआ गुलजार, छठ में लाह की लहठी का होता है खास महत्व

    मुजफ्फरपुर: देश प्रसिद्ध इस्लामपुर का लहठी मंडी हुआ गुलजार, छठ में लाह की लहठी का होता है खास महत्व

    मुज़फ़्फ़रपुर(MUZAFFARPUR): बिहार में लोक आस्था का महापर्व छठ व्रत को लेकर महिलाओं में खासा उत्साह है.  बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर का इस्लामपुर लहठी मंडी जो विभिन्न प्रकार के फैंसी लहठी के लिए देश ही नहीं विदेशों तक प्रसिद्ध है. बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के इस लहठी मंडी की बनी हुई लहठी देश के विभिन्न बड़े चेहरे के घर भी भेजी जाती रही है. चाहे वह फ़िल्म स्टार हो क्रिकेट के स्टार हो या राजनेता सभी के घर की महिलाएं इसे खूब पसंद करती है. लहठी बाज़ार में अगर देश में कहीं चर्चा होती है तो बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले के शहरी क्षेत्र के इस्लामपुर लहठी मंडी उसमें  सुमार होती है. इस मंडी में वैसे तो हमेशा ही ग्राहकों की ठीक ठाक संख्या रहती है लेकिन खासकर जब बिहार में प्रसिद्ध लोक आस्था का महापर्व छठ हो या सावन तब इस मंडी की रौनक देखते ही बनती है. बिहार में अभी चार दिवसीय लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा की शुरुआत हुई है इसको लेकर छठ व्रत करने वाली महिलाओं तथा घर वालों की भीड़ लहठी मंडी में लाह से निर्माण किया हुआ लहठी खरीदने के लिए मानो भीड़ उमड़ पड़ा है.

    लाह होता है शुद्ध 

    मान्यता है कि इस पर्व में साफ सफाई काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है इसलिए बिना किसी दूसरे चीज़ को मिलाकर लाह की लहठी तैयार की जाती है. इसलिए पौराणिक काल से ही इसका डिमांड अच्छा रहा है. छठ व्रत करने वाली महिलाओं से पूछने पर उन्होंने कहा कि लाह जंगलों से ही तैयार होता है और काफी शुद्ध माना जाता है. इसलिए लाह की लहठी पहन कर महिलायें छठ व्रत करती है.

    लहठी दुकानदार भी काफी उत्साहित 

    वहीं दुकानदार भी काफी उत्साहित हैं क्योंकि कोरोना काल को लेकर दो वर्ष काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा था. दुकानदार को उसकी भरपाई के आस जगी है. आपको बता दें कि बिहार में मनाया जाने वाला चार दिवसीय लोक आस्था का महापर्व नहाय खायें से शुरू होता है जिसके बाद अगले दिन रात को (खड़ना) चन्द्रमा की पूजा महिलाएं विधि विधान से घर में अलग चूल्हे पर बनाई गई खीर, रोटी से करती है. उसके बाद फिर अगले दिन डूबते सूर्य को सभी प्रकार के फलों से नदी तालाब में स्नान कर खड़े होकर अर्घ देती है और अंतिम दिन उगते सूर्य के अर्घ के साथ इस चार दिवसीय अनुष्ठान का समापन होता है. इस पूजा में शामिल होने सभी बिहार वासी प्रदेशों से अपने घर आते हैं तथा अपने सपरिवार के साथ मिलकर नए और साफ सुथरा वस्त्र के साथ विभिन्न प्रकार के मिन्नतें पूरा होने का आस लगाए रहते हैं. माना जाता है कि जो सच्चे मन से इस पूजा में अपनी मन्नते मांगते हैं भगवान उसे पूरा जरूर कर देते हैं.  


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