विभाजन के दर्द को बयान करने वाली इन फिल्मों की कहानी में छुपा है आजादी का जश्न भी, जानिये कैसे

    विभाजन के दर्द को बयान करने वाली इन फिल्मों की कहानी में छुपा है आजादी का जश्न भी, जानिये कैसे

    टीएनपी डेस्क(TNP DESK): देश आज अपनी आजादी का 75वां वर्ष मना रहा है. भारत 15 अगस्त 1947 को 200 साल की गुलामी से आजाद हुआ लेकिन उसी दिन हमारे देश ने विभाजन का दर्द भी देखा. 15 अगस्त 1947 के दिन ही  भारत- पाकिस्तान का विभाजन (India Pakistan Partition) हुआ. दरअसल, यह विभाजन सिर्फ दो देशों का नहीं था बल्कि बरसों पुराने एहसास का भी बंटवारा था. इसके अलावा घरों, परिवारों, रिश्तों और भावनाओं का विभाजन था. महज कुछ घंटों में जो अपने थे वो पराये हो गए और जो पराये थे वो अपने. जिसे कुछ लोग कल तक अपना देश कहते थे वो आज से उनके लिए परदेस होने वाला था. एक ही रात में भाईयों की तरह रहने वाले दो समुदायों के लोग आपस में दुश्मन बन गए. ऐसा माना जाता है यह सब 14-15 अगस्त 1947 को हुआ, लेकिन इस विभाजन की लकीरों पर मुहर आजादी से करीब दो-तीन दिन पहले लग गई थी. आज हम आपको कुछ फिल्मों के बारे में बतायेंगे जो विभाजन को दिखाने की कोशिश करती है. साथ ही इन फिल्मों की कहानी में आजादी का जज्बा भी छुपा हुआ है.

    1. गदर- एक प्रेम कथा

    इस फिल्म में जहां सनी देओल, अमीषा पटेल, अमरीश पुरी और सुरेश ओबेरॉय जैसे सितारों ने अभिनय किया है. यह फिल्म काफी हिट रही थी. लोगों के दिलों में यह फिल्म आज भी राज करती है. इस फिल्म से सनी देओल की एक अलग पहचान बनी थी. यह फिल्म साल 2001 में रिलीज हुई थी लेकिन आज भी इस फिल्म के कई सीन्स लोगों के दिलों में जिंदा है. सबसे ज्यादा सनी देओल का चापानल उखाड़ने वाला और भारत जिन्दाबाद था, जिन्दाबाद है और जिन्दाबाद रहेगा.

    1. पिंजर

    यह फिल्म साल 2003 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म में बंटवारे की पृष्ठभूमि पर हिन्दू-मुस्लिम समस्याओं पर ऐसी फिल्म है जो बताती है सदभाव से समस्याओं का हल किया जा सकता है. फिल्म में विभाजन के बारे में दिखाया गया है, हिंदू-मुस्लिम की दुशमनी दिखाई गई है लेकिन फिल्म के लास्ट में कैसे प्रेम से सभी समस्याओं का हल हो सकता है वो दिखाया गया है.

    1. ट्रेन टू पाकिस्तान

    फिल्म 'ट्रेन टू पाकिस्तान' खुशवंत सिंह के 1956 में लिखे इसी नाम के चर्चित उपन्यास पर आधारित है, जिसकी कहानी भारत-पाक सीमा पर बसे एक काल्पनिक गांव मनो माजरा पर केंद्रित है. इस फिल्म में दिखाया गया है कि एक गांव है जो बिल्कुल शांत है, वहां सिख और मुसलमान खुशी से रहते हैं, लेकिन गांव की ज़्यादातर ज़मीन सिखों की है और मुसलमान वहां मजदूर के रूप में काम करते हैं लेकिन जब देश का बँटवारा होता है तो सांप्रदायिक दंगों का तूफान सब कुछ तहस-नहस कर देता है.

    आज देश आजादी का 75वां वर्ष मना रहा है. अगर आज आप भी आजादी से जुड़ी फिल्में देखना चाहते हैं तो ये फिल्म आप अपने परिवार के साथ देख सकते हैं.


    the newspost app
    Thenewspost - Jharkhand
    50+
    Downloads

    4+

    Rated for 4+
    Install App

    Our latest news