लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के दौरान अगर हो गया बच्चा तो जायाज होगा या नाजायज, पढ़ें क्या कहता है कानून

    लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के दौरान अगर हो गया बच्चा तो जायाज होगा या नाजायज, पढ़ें क्या कहता है कानून

    टीएनपी डेस्क(TNP DESK):21वीं सदी में दुनिया इतनी मॉडर्न हो चुकी है कि अब शादी से पहले ही कपल्स एक दूसरे के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहते है.भले हमारी भारतीय संस्कृति में शादी का रिवाज है लेकिन कानून की ओर से 18 साल की उम्र के युवक और युवतियों को अपनी पसंद के स्वादिष्ट मर्द या महिला के साथ रहने का पूरा अधिकार है.ऐसे में सवाल उठता है कि अगर लिव इन रिलेशनशिप में रहने के दौरान किसी कपल्स का बच्चा होता है तो उसको कानूनी तौर पर जायज माना जाएगा या नाजायज चलिए इसका जवाब आपको बता देते है.

    पढ़ें क्या कहता है कोर्ट

    लिव इन रिलेशनशिप क़ानूनी रूप से हमारे देश में वैध माना जाता है. कोर्ट ने भी इसे सही ठहराया है लेकिन हमारे समाज के कुछ लोग इसे गलत बताते है क्योंकि इसकी वजह से समाज के युवा गलत दिशा में जाते है वहीं बच्चों को गलत संदेश जाता है.लोग चाहे जो भी सोचे लेकिन कोर्ट की नजर में जो सही है वह सही है, लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि अगर लिव इन रिलेशनशिप में रहने के दौरन किसी का बच्चा होता है तो उसको कानूनी रूप से उसके बाप का नाम मिलेगा या नहीं इसके बारे में विस्तार से जानते है.

    क्या कहता है हमारा भारतीय कानून

    आपको बता दें कि अगर लिव इन रिलेशनशिप में रहने के दौरान किसी कपल्स का बच्चा होता है तो वह कानूनी रूप से जायज माना जाता है.सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चे जायज है.अपने महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर एक पुरुष और महिला बहुत लंबे समय तक 'पति-पत्नी की तरह' रहें और इस रिश्ते से उन्हें कोई बच्चा हो तो कानून उन्हें शादीशुदा मानेगा.

    लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चे जायज है

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चे जायज है. अपने महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर एक पुरुष और महिला बहुत लंबे समय तक 'पति-पत्नी की तरह' रहें और इस रिश्ते से उन्हें कोई बच्चा हो तो कानून उन्हें शादीशुदा मानेगा.जस्टिस बीएस चौहान और जे चेलामेश्वर की एक बेंच ने ऐडवोकेट उदय गुप्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्टीकरण दिया.हाई कोर्ट ने कहा था कि 'एक वैध शादी के लिए यह जरूरी नहीं है कि शादीशुदा जोड़ों से संबंधित सभी पारंपरिक कर्तव्यों का पालन किया जाए और उसे संपन्न किया जाए.वही कोर्ट के इस फैसले को जब चुनौती दी गई और कहा गया कि ऐसा करने से हमारे समाज में शादी की व्यवस्था खत्म हो जाएगी लेकिन कोर्ट ने तर्क दिया की ये व्यवस्था केवल लिव इन रिलेशनशिप तक ही सिमित है.


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