एक अमन के खात्मे के बाद शांत पड़ गए गैंगस्टर! अब झारखंड में आतंक का हुआ सफाया  

    एक अमन के खात्मे के बाद शांत पड़ गए गैंगस्टर! अब झारखंड में आतंक का हुआ सफाया  

    रांची(RANCHI): झारखंड में उग्रवाद के बाद संगठित गिरोह बड़ी तेजी से पनप रहे थे.  लेकिन एक गैंगस्टर के एनकाउंटर के बाद पूरा माहौल ही बदल गया.  पुलिस का इकबाल जो अपराधियों में से खत्म हो गया था वह हद तक वापस आ गया है. अपराधियों को डर है कि कहीं उनका भी एनकाउंटर ना हो जाए.  तभी तो अमन साहू के एनकाउंटर के बाद बहुत हद तक झारखंड में अपराधिक घटनाओं में कमी आई है, और लोग खुलकर अपने काम को कर रहे हैं.  ऐसे में देखे तो अमन साहू का एनकाउंटर जब हुआ पूरा झारखंड उसकी तारीफ कर रहा था  कि एक आतंक का खात्मा बेहद जरूरी था, लोगों ने पुलिस की सराहना की, पक्ष से लेकर विपक्ष तक इस काम से बेहद खुश दिखा.  जिसका असर भी अब देखने को मिलने लगा है.

    किस गैंग का कहां वर्चस्व

    तो चलिए सबसे पहले आपको बताते हैं कि झारखंड में कितने गैंग सक्रिय हैं.  जो आतंक फैला रहे थे.  पहले नंबर पर अमन साहू गैंग है फिर आता है अमन श्रीवास्तव, अखिलेश सिंह, पांडे गिरोह सुरजीत सिन्हा अपने गुर्गों के द्वारा  आतंक को फैला रहा था.  और सभी का अलग-अलग इलाका है. अमन साहू गैंग जहां रांची से लेकर चतरा हजारीबाग पलामू तक सक्रिय था.  तो दूसरी ओर श्रीवास्तव गैंग रांची और हजारीबाग रामगढ़ में गैंगवार की वारदात को अंजाम देता था.  तो वहीं सुजीत सिन्हा गैंग पलामू और रांची में सक्रिय रहा.  लेकिन जब अमन साहू का एनकाउंटर हुआ और जेल से जो गतिविधि झारखंड में अपराध के लिए बनाई जा रही थी.  उस पर लगाम लग गया.

    जेल से होता था सब कुछ तय

    अब तक देखा जाता था कि जेल में बंद गैंगस्टर जेल से ही गैंग चल रहे थे.  चाहे अमन साहू की बात करें या फिर अमन श्रीवास्तव, सुजीत सिन्हा सभी का गैंग जेल से ऑपरेट होता था. जेल में सभी का सेंटर था और वहां से लेवी वसूलने से लेकर हत्या तक की पटकथा लिखी जाती थी.  जेल से एक आदेश होता था और झारखंड में कहीं भी गोली चल जाती थी.  किससे  कितना वसूली करना है यह भी तय झारखंड के जेलों में बंद गैंगस्टर कर रहे थे.

    जेल में अपराधियों की समानंतर व्यवस्था

    एक व्यवस्था जेल में ही चलाई जा रही थी उसमें पुलिस की भी मिली भगत से इनकार नहीं किया जा सकता.  क्योंकि जेल की सुरक्षा झारखंड पुलिस के अधीन ही आती है.  और जेल प्रशासन के नाक के नीचे अपराधिक घटनाओं की पटकथा लिखी जाती थी.  उसके बाद फोन पर ही आदेश किया जाता था और फिर कत्ल किसी का भी हो जाता.  जेल की सुरक्षा की जब बात कर रहे हैं तो आपको धनबाद में अमन सिंह हत्याकांड याद होगा की कैसे गैंगस्टर अमन सिंह की हत्या धनबाद जेल के अंदर कर दी गई थी.  जेल में पिस्टल पहुंचता है और फिर गोलियों की आवाज सुनाई देती है.  जब पास जाकर लोगों ने देखा तो अमन जमीन पर गिर पड़ा था.  इससे  ही आप अंदाजा लगा लीजिए कि झारखंड का जेल कितना सुरक्षित है.

    मार्च अमन के लिए बना काल

    इसके बाद एक गैंग का तो सफाया हुआ लेकिन अभी भी झारखंड में अमन साहू का वर्चस्व चल रहा था उसका  गैंग लगातार बढ़ता जा रहा था.  लेकिन आखिरकार मार्च का महीना अमन के लिए काल बनकर लौटा.  जब पुलिस गिरफ्त से भागने की कोशिश करने लगा. और पलामू में अमन गैंग का द एंड हो गया

    जब अमन का एनकाउंटर हुआ इसके बाद झारखंड में सभी गैंग शांत पड़ गए.  जो जेल से गतिविधि हो रही थी वह भी हर रुक गई है.  अब सब गैंग शांत पड़े हैं जो एक झारखंड के लिए अच्छी खबर है.  ऐसे में देखें तो झारखंड के डीजीपी अनुराग गुप्ता संगठित गिरोह के खिलाफ तेवर में दिखे थे. साफ तौर पर कहा था कि तुम्हारे से ज्यादा हथियार हमारे पास है.  हम अब रुकने वाले नहीं है.  जो झारखंड में आतंक मचाएगा उसको बकसेंगे नहीं.   


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