राज्य गठन  के 21 साल भी प्यास बुझाने के लिए प्राकृतिक जलस्त्रोत पर निर्भर  हैं संथाल के आदिवासी

    राज्य गठन  के 21 साल भी प्यास बुझाने के लिए प्राकृतिक जलस्त्रोत पर निर्भर  हैं संथाल के आदिवासी

    कहते हैं किसी गाँव,जिले ,राज्य का विकास उसके रास्तों से होकर ही पहुँचती है ,मगर जहां तक आजादी के इतने वर्षों बीत जाने के बाद भी अगर सडक नहीं पहुंची तो उस गाँव या क्षेत्र के विकास का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है .ऐसा ही कुछ है गोड्डा जिले के सुन्दर पहाड़ी प्रखंड के मासपाडा गाँव का हाल ,जहां आज भी आदिवासी  प्राकृतिक जल स्त्रोत का पानी पीने को विवश हैं.

    आजादी के इतने वर्षों के बाद भी पानी के लिए तरस रहे है आदिवासी

    झारखंड गठन को 21 साल हो गये लेकिन आज बड़ी संख्या भी गांवों में पीने का पानी नहीं है .गोड्डा जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर और सुन्दरपहाड़ी प्रखंड मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर प्रकृति की गोद में बसे ये गाँव मासपाडा गाँव की आदिवासी महिलायें हैं एक किलोमीटर दूर से पानी लाने सुबह सुबह निकलती हैं .इन महिलाओं का सालों भर दिन की शुरुआत पानी भरने से होती है. .इनके गाँव में प्राकृतिक जल स्त्रोत के अलावे पानी का कोई और जलस्त्रोत नहीं है .

                        पहाडों से पानी लाती महिलाएं

    पहाड़ियों पर बसा है गांव,प्राकृतिक जलस्त्रोत ही है एक मात्र सहारा

    इस गाँव का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि ये दुर्गम पहाड़ियों के ऊपर बसा हुआ है, यहां लगभग 400 लोगों की आबादी है .यहाँ तक पैदल ही पहुंचा जा सकता है . अब सड़क नही है तो विद्यालय ,बिजली और पक्के मकान की उम्मीद करना भी यहाँ बेमानी है .यहाँ के कुछ युवा जो कभी सुन्दरपहाड़ी प्रखंड ये दूसरे गांवों में जाकर रोजी रोजगार तलाश कर जीविका चलाते हैं .अपनी खेती के नाम पर साल में एक बार वर्षा जल आधारित धान की फसल उपजा लेते हैं,जिनसे सालों भर का अनाज भी मुश्किल से  हो पाता है .गाँव के कुछ युवा बताते हैं कि भले ही हमारे क्षेत्र के जन प्रतिनिधि आदिवासी होते आये हैं ,मगर हमेशा से उन्हें आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिल पाया हैं .

                         प्राकृतिक जल स्त्रो से प्यास बुझातें है ग्रामीण

    हर बार आश्वासन से ठगे जाते रहे हैं आदिवासी

    झारखंड में आदिवासियों के विकास की बात करें तो उन्हें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में बहुत काम करना बाकी है.,देखना होगा कि इस बार भी इनके संघर्ष भरे जीवन में राज्य के युवा सोच वाले मुखिया कुछ बदलाव ला पाते हैं या फिर राज्य में गरीबों की सरकार कहीं जाने वाली सरकार भोले-भाले आदिवासी ग्रामीणों को आश्वासन की लॉलीपॉप ही थमाकर छोड़ देगी.


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