इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए नीति आयोग ने लॉन्च किया शून्य अभियान 

    इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए नीति आयोग ने लॉन्च किया शून्य अभियान 


    इलेक्ट्रिक वाहन के क्षेत्र में हाल ही में नीति आयोग और Rocky Mountain Institute (RMI) ने शून्य Campaign को लॉन्च किया है. Rocky Mountain Institute जिसे RMI के नाम से भी जाना जाता है, एक स्वतंत्र स्वतंत्र रूप से नॉन प्रॉफ़िट संस्था है जिसकी स्थापना 1982 मे की गई थी. 

    शून्य Campaign क्या है? 

    शून्य कम्पेन  यह उपभोक्ताओं और उद्योग के साथ मिलकर ज़ीरो प्रदूषण वाले माल ढुलाई वाहनों को बढ़ावा देने की एक पहल है. इस अभियान के जरिए शहरी उपभोक्ताओं को इलेक्ट्रिक वाहनों के स्वास्थ्य, पर्यावरण और आर्थिक लाभों के बारे में जागरूक करना है और  डिलीवरी सेगमेंट में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के उपयोग को अपनाने के लिए प्रेरित करना है. इस अभियान के अंतर्गत, इलेक्ट्रिक VEHicle के निर्माण और डेलीवेरी की दिशा में किसी इंडस्ट्री के प्रयासों को पहचानने और बढ़ावा देने के लिए एक corporate branding और certification programme कार्यक्रम भी शुरू किया जा रहा है. एक ऑनलाइन ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से इस अभियान के अंतर्गत वाहनों से जुड़े प्रदूषण, ईंधन खपत , कार्बन बचत और इन वाहनों से मिलने वाले अन्य लाभों को डेटा के माध्यम से इसके प्रभाव को साझा करेगा. नीति आयोग की इस बैठक में 30 से भी ज्यादा कंपनियों ने भाग लिया जिसमे Mahindra Electric, Tata Motors, Zomato, ,Bluedart, Hero Electric, and Swiggy  आदि शामिल थे, इस अभियान का मुख्य उद्देश्य शहरी माल ढुलाई क्षेत्र से प्रदूषण को खत्म करना है. इस उद्देश्य के लिए, ई-कॉमर्स कंपनियों, वाहन निर्माताओं और लॉजिस्टिक्स फ्लीट ऑपरेटरों को अवसर को पहचानने के लिए कहा गया है
    शून्य अभियान से जुड़ी चुनौतियाँ 
    शून्य अभियान को भारत में सफल होने में बहुत सारी चुनौतियाँ भी हैं. वर्तमान में भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) बाजार दुनिया में सबसे कम प्रवेश दर पर है. इसमें पूंजीगत लागत अधिक है और अदायगी (payoff) अनिश्चित है. भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे बैटरी, सेमीकंडक्टर्स, कंट्रोलर आदि के उत्पादन में तकनीकी रूप से कमी है जो ईवी उद्योग की रीढ़ है, इसके बिना ईवी उद्योग की कल्पना नहीं की जा सकती है. भारत के पास लिथियम और कोबाल्ट का कोई ज्ञात भंडार नहीं है, जो इसे जापान और चीन से लिथियम-आयन बैटरी के आयात पर निर्भर करता है. ईवी की सर्विसिंग लागत भी अधिक होती है और सर्विसिंग के लिए उच्च स्तर के कौशल की आवश्यकता होती है. भारत में ऐसे कौशल विकास के लिए समर्पित ट्रैनिंग कोर्स का अभाव है. इन चुनौतियों से पार पा लिया जाए तो भारत में इलेक्ट्रिक वाहन सफलता पूर्वक सड़कों पर दौड़ेंगी. 

    रिपोर्ट: प्रकाश, रांची डेस्क


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