खूंटी, लोहरदगा, चाईबासा और पलामू में क्या है चुनावी मुद्दा, स्थानीय मुद्दों का जोर या राष्ट्रीय मुद्दों का शोर

    खूंटी, लोहरदगा, चाईबासा और पलामू में क्या है चुनावी मुद्दा, स्थानीय मुद्दों का जोर या राष्ट्रीय मुद्दों का शोर

    रांची (RANCHI) : झारखंड में लोकसभा चुनाव का सियासी संग्राम शुरू हो गया है. भीषण गर्मी के बावजूद विभिन्न पार्टी के नेता मतदाताओं को लुभाने के लिए जमकर पसीना बहा रहे हैं. वहीं लोकसभा चुनावों में पूरे दमखम से जुटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झारखंड में चुनाव प्रचार का आगाज चाईबासा से कर दिया है. दो दिवसीय दौरे पर झारखंड पहुंचे पीएम मोदी की पहली जनसभा चाईबासा में हुई. आज पलामू और सिसई में होने वाली है. चौथे फेज में 13 मई को झारखंड के चार सीटों खूंटी, लोहरदगा, चाईबासा और पलामू में मतदान होना है. जिसके लिए सभी पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत झोक दी है.

    चार सीटों पर क्या है असली मुद्दा

    झारखंड के जिन चार लोकसभा सीटों पर 13 मई को मतदान होना है. वहां कई ऐसे मुद्दे हैं जिस पर काम होने बाकी हैं. अगर हम खूंटी संसदीय क्षेत्र की बात करें तो यहां आज भी शिक्षा, बेरोजगारी, पलायन, पेयजल मूल समस्या है. यह इलाका आज भी नक्सल प्रभावित है. सरकारी तंत्र द्वारा समस्याओं को दूर करने के लिए कई ठोस कदम उठाए गए, इसके बावजूद क्षेत्र की समस्या दूर नहीं हुई. अभी भी सरकार को यहां बहुत कुछ करना बाकी है. लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में भी कमोबेश यही समस्या है. गुमला-लोहरदगा जिले में बॉक्साइट के भंडार हैं, पर क्षेत्र बेरोजगारी, पलायन, मानव तस्करी से जूझ रहा है. यहां कारखाना लग जाए तो क्षेत्र का कायाकल्प हो जायेगा. कई ऐसे इलाके हैं जहां अभी भी रेल लाइन, बिजली और सड़क नहीं है. अगर ये सुविधाएं लोगों को मिल जाए तो क्षेत्र का समग्र विकास होगा. क्षेत्रीय दल समय-समय पर मांगे उठाई है, पर प्रमुख पार्टियों की उदासीनता खलती है.

    सिंहभूम संसदीय क्षेत्र में आदिवासियों की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया है. इस इलाके की पहचान अब भी आर्थिक रूप से पिछड़े इलाकों में होती है. इस क्षेत्र की एक बड़ी आबादी गांवों में रहकर खेती और जंगल से लकड़ी काटकर अपना पेट पालते है. रोजगार के साधन नहीं होने के कारण इनके जीवन में कोई सुधार नहीं आया है. उद्योग धंधों का घोर अभाव है. यहां भी बेरोजगारी और पलायन बड़ी समस्या है. बीते दस सालों में कोई नया उद्योग नहीं लगा है. सिंहभूम के कई क्षेत्रों में आज भी बिजली नहीं पहुंची है. सड़क निर्माण नहीं हुआ है. पलामू लोकसभा क्षेत्र में भी कई ऐसे मुद्दें हैं, जिसपर काम अभी तक नहीं हुआ है. यहां पेयजल, सिंचाई, बिजली, सड़क, बेरोजगारी, पलायन आज भी बदस्तूर जारी है. बीते दस साल से भाजपा के बीडी राम सांसद हैं, लेकिन कई इलाकों में अभी भी काम अधूरा है. पलामू संसदीय क्षेत्र के कई इलाके आज भी नक्सलियों से प्रभावित है. 

    झारखंड में है ये बड़ा मुद्दा

    झारखंड में वनोपज, वनाधिकार कानून, पेसा एक्ट, सरना धर्म कोड, स्थानीयता सहित कई ऐसे स्थानीय मांग है, जो आज तक पूरी नहीं हुई. बड़े-बड़े नेता चुनावी मौसम में आकर इन मांगों पर हुंकार भरते हुए आश्वासन तो देते हैं, लेकिन इस मांगों पर कभी भी कोई काम नहीं हुआ. यहां जल, जंगल, जमीन की राजनीति हमेशा होती रही है. सभी पार्टियों के नेता भी कहते हैं कि हम इसकी रक्षा करेंगे. जबकि पूरे झारखंड में ये एक बड़ा मुद्दा है. यहां राष्ट्रीय मुद्दे पर वोट पाना आसान नहीं है. यहां नेताओं के मन में झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में आदिवासी और उनसे जुड़े मुद्दे अहम हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या आदिवासी भी अपने इन मुद्दों को ध्यान में रखकर ही वोट करेंगे.


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