झारखंड विधानसभा चुनाव: झारखंड में कल्पना बनेंगी हकीकत! आखिर सभी पर कैसे पड़ गई अकेले भारी

    झारखंड विधानसभा चुनाव: झारखंड में कल्पना बनेंगी हकीकत! आखिर सभी पर कैसे पड़ गई अकेले भारी

    रांची(RANCHI):  झारखंड में चुनाव प्रचार के अंतिम दिन भी सभी नेता अपनी जोर लगाने में लगे हैं. केंद्रीय मंत्री, प्रधानमंत्री सहित कई मुख्यमंत्री चुनावी दंगल में अपनी-अपनी पार्टी के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं. लेकिन झामुमो की नेत्री कल्पना सोरेन सभी पर अकेले भारी पड़ गई है. दिन हो या रात ताबड़तोड़ जनसभा कर झामुमो के पक्ष में प्रचार कर वोट मांग रही हैं. अगर देखें तो हेमंत से ज्यादा प्रभाव जनता के बीच कल्पना का बन गया है. ऐसे में चर्चा है कि क्या कल्पना झारखंड की हकीकत में बदलेगी या परिणाम इससे उलटा होगा.  

    दरअसल, कल्पना सोरेन ने कभी राजनीति में आने का नहीं सोचा था. एक ऐसी परिस्तिथि बनी जो उन्हें राजनीति में लेकर आ गई. लेकिन किसी को उम्मीद नहीं थी कि कल्पना इस तरह से कम समय में ही झारखंड की राजनीति को अलग दिशा दे देंगी. जिस तरह से हेमंत के जेल जाने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा की कमान संभाल कर कल्पना आगे बढ़ीं तो उसके बाद कारवां बढ़ता चला गया. इनके साथ एक जनसैलाब जुटने लगे.

    पहले लोकसभा चुनाव में कल्पना का जादू चला और खुद की बनाई रणनीति में पांच ट्राइबल सीट को जीत लिया. यह चुनाव कल्पना का टेस्ट था जिसे पार कर लिया था. अब नजर विधानसभा चुनाव में है. विधानसभा चुनाव के दौरान एक दिन में कल्पना सोरेन 7 से 8 जनसभा कर रही हैं. इस जनसभा में जनसैलाब उमड़ रहा है. कल्पना सोरेन को सुनने के लिए लोग घंटो इंतजार करते दिख रहे हैं. इस तस्वीर को देख कई लोग टेंशन में हैं. आखिर इतना कम समय में इतना क्रेज कैसे हो गया.                       

    अगर कल्पना के क्रेज की बात करें तो अन्य नेताओं कि तुलना में राजनीति में कल्पना का अनुभव कम है. लेकिन एक राजनैतिक रसूख वाले परिवार की बहु थीं तो दिन-रात अलग माहौल में गुजरा और जब मैदान में उतरी तो माहौल ही बदल दिया. इनके भाषण देने का स्टाइल भी एक दम अलग है. सीधे भावनाओं के साथ जोड़ते हुए शब्द का इस्तेमाल करती हैं. जिससे लोग कल्पना को हकीकत में बदलता देख रहे हैं.

    कल्पना हकीकत बनेगी या नहीं इसपर राजनितिक जानकार बताते हैं कि झारखंड की राजनीति अन्य राज्यों से अलग है. यहां के मुद्दे सबसे अलग रहते हैं. ऐसे में हेमंत सोरेन झारखंड के उन्ही जटिल मुद्दों को लेकर झारखंड की सत्ता में आये थे. अब कल्पना सोरेन भी झारखंडियत की बात मंच से कर रही हैं. एक वादा और सपना झारखंड को दिखा रही हैं. सबसे बड़ी बात कि झारखंड में आदिवासी समाज के लोग काफी भोले होते हैं और जिस परिस्तिथि में कल्पना सोरेन राजनीति में आई तो सभी की भावना उनके साथ जुड़ गयी. अब कल्पना सोरेन भले मुख्यमंत्री नहीं बनेंगी लेकिन पीछे से हेमंत सोरेन के साथ काम खुद करते हुए दिखेंगी. 

    रिपोर्ट: समीर हुसैन 


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