घाटशिला उपचुनाव : सोमेश या बाबूलाल-किसका खेल बिगाड़ेंगे टाइगर जयराम ! इलाके में मंथन शुरू

    घाटशिला उपचुनाव : सोमेश या बाबूलाल-किसका खेल बिगाड़ेंगे टाइगर जयराम ! इलाके में मंथन शुरू

    रांची(RANCHI): झारखंड में घाटशिला उपचुनाव की तारीख नजदीक आते आते सरगर्मी बढ़ती जा रही है. जनता भी अब मंथन में जुटी है आखिर किसके साथ जाने की तैयारी है. अब तक लड़ाई सोमेश और बाबूलाल के बीच दिख रही थी लेकिन डुमरी विधायक जयराम के इंट्री के बाद से अब चर्चा है कि जयराम की पार्टी का रोल चुनाव में क्या रहने वाला है. ऐसे में इस खबर में बात करेंगे. इस सीट के पूरे समीकरण पर आखिर अबतक क्या रोल किसका रहा और जयराम क्या करेंगे.

    अधिकतर आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है

    सबसे पहले बात घाटशिला की करें तो यह एसटी आरक्षित सीट है. पूर्वी सिंहभूम जिले के अंतर्गत आती है. यहां का अधिकतर आबादी ग्रामीण इलाके में निवास करती है और काफी शांत मिजाज के लोग इस इलाके में मिलेंगे. रोजगार की कोई खास व्यवस्था नहीं है. कुछ माइंस और अन्य छोटे मोटे व्यवसाय पर लोगों का जीवन यापन चलता है. बड़ी संख्या में यहां के लोग मेहनत मजदूरी पर निर्भर करते है.

    सबसे ज्यादा आदिवासी वोटर

    अब बात जाति की कर लें तो इस सीट पर कुल आबादी 3,21,580 है. और कुल मतदाता की संख्या  2 लाख 55 हजार 823 है.  इनमें 1,24,899 मतदाता पुरुष हैं, जबकि 1,30,921 महिला मतदाता शामिल है. सभी इस बार अपने मत का इस्तेमाल कर अपने प्रत्याशी को जीता कर विधानसभा भेजने का काम करेंगे. ऐसे में अब जातिगत आंकड़ें पर गौर करें तो कई रिपोर्टस् के मुताबिक यहां करीब 48 फीसदी एसटी यानि आदिवासी समाज की आबादी है,एससी जाती से आने वालों की संख्या 5.32 प्रतिशत वहीं ओबीसी करीब 40 के आस पास है. आकडे में थोड़ा कम या ज्यादा हो सकता है.

    क्षेत्र में नहीं है कोई प्रभाव

    अब सबसे अधिक एसटी वोटर है. ऐसे में झारखंड में बीते दो विधानसभा और एक लोक सभा चुनाव के परिणाम ने यह साबित किया है कि एसटी वोटर JMM  के साथ जाते है और इस उपचुनाव में भी ऐसा हो सकता है. हालांकि उपचुनाव में कई मायनों में अलग भी है. एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के बेटे और JLKM के रामदास मुर्मू चुनावी अखाड़े में है और दोनों ही आदिवासी समाज से आते है. ऐसे में वोट का बिखराव भी हो सकता है.

    झामुमो- भाजपा मान रहे वोट कटवा

    अब बात जयराम की करें तो जयराम महतो भले ही हाल के दिनों में राज्य में खुद को स्थापित किया. डुमरी से चुनाव लड़ कर विधानसभा तक पहुंचे और कई जगहों पर खुद की पार्टी का उम्मीदवार दिया. लेकिन कही कामयाबी नहीं मिली है. यही वजह है कि भाजपा या झामुमो भी जयराम महतो से खुद की लड़ाई नहीं मान रही है. झामुमो और भाजपा दोनों आपस में ही लड़ाई मान कर चल रही है. और जयराम को वोट कटवा बता कर आगे चुनावी माहौल को गर्म करने में लगे है.

    90 हजार से पिछले चुनाव में मिली हार

    अगर देखें तो पिछले 2024 के विधानसभा चुनाव में जयराम महतो के उम्मीदवार रामदास मुर्मू को 8 हजार के करीब वोट मिले थे. करीब उनकी हार 90 हजार वोट से हुई थी वह तीसरे स्थान पर थे. और इस बार के चुनाव से पहले जयराम महतो और आदिवासी समाज के बीच टकराव का माहौल है. लेकिन जयराम ने आदिवासी उम्मीदवार देकर इसे थोड़ा पाटने की कोशिश जरूर किया है. इसके बावजूद जयराम महतो के साथ आदिवासी का जाना मुमकिन नहीं लग रहा है.

    किसका वोट कटेगा, यह कहना मुश्किल  

    ऐसे में अब कुल मिला कर देखें तो जयराम महतो यहां किसका वोट काटेंगे और कितना काटेंगे यह कहना मुश्किल है. हो सकता है कि पिछले चुनाव से दो चार हजार अधिक पर पहुंचे लेकिन अभी जीत की लड़ाई में वह नहीं है. स्थानीय लोगों के मुताबिक जयराम एक युवा है और अच्छा कर रहे है. लेकिन उम्मीदवार क्षेत्र में उतना सक्रिय नहीं दिखते है यही वजह है कि चुनाव में इस बार भी कुछ ज्यादा नहीं कर पाएंगे. यहां सीधी लड़ाई दो बाबूलाल और सोमेश के बीच होगी.                                           


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