संताल परगना के सबसे पुराना मेला से क्यों दूरी बनाते हैं जनप्रतिनिधि, क्या है हिजला मेला की किंवदंती

    संताल परगना के सबसे पुराना मेला से क्यों दूरी बनाते हैं जनप्रतिनिधि, क्या है हिजला मेला की किंवदंती

    दुमका (DUMKA): मेला मतलब उल्लास और उमंग का समागम. मेला का इतिहास काफी प्राचीन है. 21वीं सदी में भी मेला का महत्व बरकरार है. तभी तो गांव से लेकर शहर तक साल में एक मेला जरूर लगता है. आज हम बात कर रहे है संताल परगना प्रमंडल के सबसे पुराना मेला की, जिसे राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव के नाम से जाना जाता है. 

    मयूराक्षी नदी के तट पर 1890 से लग रहा है हिजला मेला

    दुमका शहर से सटे हिजला गांव में मयूराक्षी नदी के तट पर ब्रिटिश कालीन भारत में 1890 में हिज लॉ (His Law) नाम से मेला की शुरुवात हुई थी. समय के साथ हिज लॉ का अपभ्रंश हिजला हो गया. अलग झारखंड राज्य बनने के बाद इसमें जनजातीय शब्द जोड़ा गया. पूर्ववर्ती रघुवर दास के शासनकाल में इसे राजकीय मेला का दर्जा दिया गया. वर्तमान समय में इसे राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव के नाम से जाना जाता है.

    क्या है हिजला मेला का इतिहास

    इस मेला के शुरू होने की कहानी भी कम रोचक नहीं है. 1855 में साहेबगंज के भोगनाडीह से हूल विद्रोह शुरू  हुआ, जिसके नायक सिदो कान्हू थे. अंग्रेज द्वारा भले ही इस विद्रोह को बर्बरता पूर्वक कुचल दिया गया लेकिन इस विद्रोह के बाद ब्रिटिश अधिकारी संताल समाज को सशंकित नजरों से देखने लगे थे. उस समय हिजला में सखुआ का एक विशाल पेड़ हुआ करता था, जिसके नीचे पंचायतें लगती थी. पंचायत में समस्या का समाधान होता था. इसकी जानकारी जब ब्रिटिश अधिकारी को मिली तो उन्हें ऐसा लगा कि पेड़ के नीचे बैठकर स्थानीय लोग ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सडयंत्र रचते हैं. ब्रिटिश अधिकारी ने उस पेड़ को कटवा दिया जिसके नीचे पंचायत लगती थी. पेड़ के अवशेष आज भी जीवाश्म के रूप में विद्यमान है जो संताल समाज के लोगों का धार्मिक स्थल है. कहा जाता है कि पेड़ कटने के बाद क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा. स्थानीय लोगों को लगा कि पेड़ कटने के कारण देवी देवता नाराज हो गए जिस वजह से अकाल पड़ा है. स्थानीय लोगों ने ब्रिटिश अधिकारी से मिलकर अपने दिल की बात कही और उस स्थल पर बैठक करने की अनुमति मांगी. हर तरफ से आस्वस्त होने के बाद 1890 में ब्रिटिश अधिकारी आर. कार्स्टेयर ने इसकी अनुमति दे दी.तब से प्रत्येक वर्ष फरवरी महीने में यहां मेला लगता है. 8 दिनों तक लगने वाला मेला में हर तरफ आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है.

    हिजला मेला के साथ है भ्रांतियां, उद्घाटन करने वाले नेता की चली जाती है कुर्सी

    ये तो रहा हिजला मेला का इतिहास. अब हम बात कर रहे है इस मेला से जुड़ी किंवदंती और भ्रांतियों की. ऐतिहासिक मेला होने के बाबजूद जनप्रतिनिधि इस मेला से दूरी बनाकर रखते है. इसके पीछे कहा जाता है कि इस मेला का जिस नेता ने उद्घाटन किया उसकी कुर्सी चली गई. संयुक्त बिहार में भागवत झा आजाद, बिंदेश्वरी दुबे, लालू प्रसाद यादव  इसके उदाहरण है. हाल के वर्षों में तत्कालीन कृषि मंत्री बादल पत्रलेख इस मेला के उद्घाटन में शामिल हुए थे. परिणाम देखिए पहले मंत्री पद गया बाद में विधान सभा चुनाव भी हार गए. 2024 के विधान सभा चुनाव में संताल परगना प्रमंडल के 18 सीट में से 17 सीट पर इंडिया गठबंधन ने कब्जा जमाया. एक मात्र सीट जरमुंडी विधान सभा से भाजपा प्रत्याशी देवेंद्र कुंवर ने बादल पत्रलेख को पराजित किया. आलम यह है कि अब तो अधिकारी भी इस मेला के उद्घाटन के मौके पर दूरी बना कर रखते है.

     

    2009 से हिजला के ग्राम प्रधान करते है इस मेला का उद्घाटन

    यही वजह है कि राजकीय मेला होने के बाबजूद इसका उद्घाटन हिजला गांव के ग्राम प्रधान सह मांझी बाबा सुनीलाल हांसदा द्वारा फीता काट कर किया जाता है. ग्राम प्रधान बताते है कि वर्ष 2009 से वे इस मेला का उद्घाटन करते आ रहे है. सुनिए समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन और ग्राम प्रधान सुनीलाल हंसदा से मेला का इतिहास और किंवदंती.

    रिपोर्ट: पंचम झा 


    the newspost app
    Thenewspost - Jharkhand
    50+
    Downloads

    4+

    Rated for 4+
    Install App

    Our latest news