क्या थी दिशोम गुरु की "एक मन "लाठी की सजा, क्यों नाम सुनकर ही भागने लगते थे शराबी, पढ़िए !

    क्या थी दिशोम गुरु की "एक मन "लाठी की सजा, क्यों नाम सुनकर ही भागने लगते थे शराबी, पढ़िए !

    धनबाद (DHANBAD) : शिबू सोरेन के निधन से यह बात सच है कि झारखंड ठहर सा गया है. लेकिन उनका कृतित्व इतना अधिक है कि उसे पन्नों में समेटना लगभग मुश्किल काम है. शुरू से ही वह केवल महाजनी के खिलाफ ही नहीं बल्कि शराबबंदी के पक्ष में थे. यह अलग बात है कि झारखंड बनने के बाद भी शराबबंदी को वह लागू नहीं करवा सके. बिहार में तो कर्पूरी ठाकुर के बाद नीतीश कुमार ने शराबबंदी कानून लागू किया लेकिन शिबू सोरेन 50 वर्ष पहले से ही शराबबंदी के खिलाफ थे. शराब पीने वालों को एक मन लाठी (चालीस लाठी ) की सजा देते और दिलवाते थे. आज भी बुजुर्ग बताते हैं शराब पीने वाले उन्हें देखते ही भागने लगते थे. 

    शराबी शिबू सोरेन का नाम सुनते ही भागने लगते थे 
     
    एक मन लाठी मतलब शराब पीने वाले को पकड़कर 40 लाठी की सजा दी जाती थी. टुंडी और आसपास के इलाकों में शराबियों में शिबू सोरेन का इतना खौफ था कि शराबी उनका नाम सुनकर ही भागने लगते थे.  1970 के दशक में शिबू सोरेन ने धनबाद के टुंडी के पलमा और बाद में पोखरिया आश्रम से आंदोलन की शुरुआत की थी. इस दौरान उन्होंने यह देखा कि आदिवासियों के पिछड़े होने की सबसे बड़ी वजह शराबखोरी है. इसके खिलाफ उन्होंने अभियान की शुरुआत की. 

    दुमका ने शिबू सोरेन को सिर-आँखों पर बैठाया 
     
    यह वही टुंडी है, जहां से विधानसभा चुनाव हारने के बाद शिबू सोरेन दुमका का रुख किया और फिर दुमका के ही हो गए. दुमका के लोगों ने उन्हें सिर-आंखों पर बैठाया और फिर एक सशक्त आंदोलन की शुरुआत हो गई. 70 के दशक में धनबाद के टुंडी से अलग राज्य की लड़ाई शुरू करने वाले शिबू सोरेन नक्सल प्रभावित इलाके पोखरिया में आश्रम की स्थापना की थी. बाद में इसी आश्रम का नाम शिबू आश्रम पड़ा. यही आश्रम बनाकर शिबू सोरेन ने आदिवासियों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी. इसी लड़ाई से उन्हें दिशोम  गुरु का नाम मिला. पोखरिया आश्रम आज भी शिबू सोरेन के संघर्ष का गवाह है. 

    धनबाद की टुंडी से मन टूटा तो शिफ्ट हो गए दुमका 
     
    यह अलग बात है कि फुस और मिट्टी का आश्रम पक्का बन गया है. यहां सामुदायिक भवन काम करता है. इस सामुदायिक भवन का उद्घाटन ने 2011 में खुद उन्होंने किया था. बुजुर्ग बताते हैं कि 1977 में शिबू सोरेन धनबाद के टुंडी विधानसभा से चुनाव लड़ा था लेकिन उस समय वह चुनाव हार गए.  सत्यनारायण दुदानी टुंडी से विधायक चुने गए थे.  इस हार ने उन्हें इतना अधिक विचलित किया कि टुंडी  इलाका ही छोड़ दिए और दुमका शिफ्ट हो गए. फिर तो दुमका से उन्होंने केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय किया. 70 के दशक में धनबाद के टुंडी और पारसनाथ के  जंगलों में शिबू सोरेन की समानांतर सरकार चलती थी. 

    रिपोर्ट-धनबाद ब्यूरो


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