झारखंड में निकाय चुनाव लड़ने वालों को यह दशहरा क्या अच्छी खबर लेकर आया है,पढ़िए इस रिपोर्ट में

    झारखंड में निकाय चुनाव लड़ने वालों को यह दशहरा क्या अच्छी खबर लेकर आया है,पढ़िए इस रिपोर्ट में

    धनबाद: झारखंड में निकाय चुनाव लड़ने वालों के लिए इस साल का दशहरा अच्छी खबर लेकर आया है. निकाय चुनाव की बड़ी बाधा अब दूर हो गई है. पिछले कई सालों से झारखंड के निकाय सरकारी अधिकारियों के अधीन है. 

    चुनाव नहीं होने से यह यह हाल बना है. राज्य सरकार ने आयोग के आयुक्त के पद पर अलका तिवारी की नियुक्ति कर दी है. यह पद लंबे समय से खाली था. अलका तिवारी 30 सितंबर को मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत हुई थी. उसके बाद राज्य सरकार ने उन्हें आयोग के आयुक्त के पद पर नियुक्त कर दिया है. 

    उनका कार्यकाल पदभार ग्रहण करने की तिथि से 4 साल तक होगा. इधर, निकाय चुनाव को लेकर सरकार पर भी दबाव है .शहर की सरकार नहीं होने से लोगों को भी परेशानी है. तो छोटे-बड़े जनप्रतिनिधि भी परेशानी में है. यह अलग बात है कि झारखंड में निकाय चुनाव नहीं होने से केंद्र सरकार ने कई मद की राशि रोक दी है. साफ कहा है कि निकाय चुनाव होने के बाद ही राशि वे विमुक्त की जाएगी. 

    चुनाव नहीं होने से झारखंड सरकार को भी नुकसान है, तो यहां के लोगों को भी परेशानी है .हेमंत सरकार का पिछला कार्यकाल बिना निकाय चुनाव के ही बीत गया. नया कार्यकाल का भी 8 महीने से अधिक वक्त बीत गया है .अब आयोग के आयुक्त के पद पर नियुक्ति के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि झारखंड में निकाय चुनाव के कार्यों में तेजी आएगी.  निकाय चुनाव में राजनीतिक पार्टियों की भी परीक्षा होगी. यह अलग बात है कि झारखंड में अब तक निकाय चुनाव पार्टी आधारित नहीं हुआ है. लेकिन हर उम्मीदवार को किसी ने किसी दल का समर्थन होता है. कांग्रेस तो पहले से ही निकाय चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है. यह अलग बात है कि कांग्रेस झारखंड में गठबंधन में है और गठबंधन के निर्णय को ही उसे मनाना होगा. 

    यह बात भी सच है कि निकाय चुनाव में उम्मीदवारों का समर्थन करना किसी भी दल के लिए बहुत आसान नहीं होगा. क्योंकि हर दल में निकाय चुनाव लड़ने वालों की संख्या 2..4 से अधिक है. ऐसे में सामंजस्य बैठाना बहुत आसान नहीं होगा. निकाय चुनाव में आरक्षण का रोस्टर क्या होगा, यह  तय होने के बाद कुछ संभावित उम्मीदवारों के चेहरे पर खुशी रहेगी, तो कुछ मायूस भी रहेंगे. 

    चुनाव नहीं होने का सबसे अधिक खामियाजा निर्वतमान वार्ड पार्षदों को भुगतना पड़ता है. लोग छोटे-मोटे कामों के लिए उनके पास जाते हैं. शिकायत करते हैं, लेकिन निवर्तमान पार्षद बहुत कुछ लोगों की मदद नहीं कर पाते. इस वजह से निवर्तमान पार्षदों को जनता का कोप भाजन भी बनना पड़ता है.

    रिपोर्ट: धनबाद ब्यूरो 


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