राज्य बनने के 24 साल बाद भी यह गांव क्यों है इतना पिछड़ा, सरकार की योजनाओं औऱ विकास की रोशनी क्यों नहीं पहुंच पाई इस गांव में, देखिए जमीनी हकीकत की असली कहानी

    राज्य बनने के 24 साल बाद भी यह गांव क्यों है इतना पिछड़ा, सरकार की योजनाओं औऱ विकास की रोशनी क्यों नहीं पहुंच पाई इस गांव में, देखिए जमीनी हकीकत की असली कहानी

    सरायकेला (SARIKELA): देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. इसके साथ ही झारखंड राज्य बने हुए 24 वर्ष हो गया है. लेकिन फिर भी झारखंड का एक ऐसा गांव है, जहां ना तो पीएम मोदी की विकास की गाड़ी पहुंची है औऱ ना ही राज्य सरकार की विकास की गंगा बह रही है. और आलम कुछ ऐसा हो गया है कि रोजगार के लिए ग्रामीण दूसरे राज्य में पलायन करने को मजबूर हो रहे है. हम बात कर रहे है झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के दलमा सेंचुरी की, जहां बोड़ाम प्रखंड के अधीन बोटा पंचायत में आदिवासी भूमिज मुंडा परिवार के लोग रहते है. लेकिन गांव की स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि रोजगार के लिए ग्रामीण दूसरे राज्य में पलायक कर रहे है और गांव में केवल बुजुर्ग और महिलाए ही रहती है.

    मूलभूत सुविधा से ग्रामीण वंचित

    बता दें कि दलम सेंचुरी एक ऐसी जगह है जहां दूर दराज से लोग घुमने आते है. इस जगह काफी संख्या में जंगली जानवर रहते है. लेकिन बोटा पंचायत की हालत कुछ ऐसी है कि भय के साय में जीवन बीताने को गांव के ग्रामीण मजबूर हो गए है. बात करते हुए ग्रामीण ने बताया कि इस गांव में विकाश की बात तो दूर है. लेकिन चुनाव के समय नेता मंत्री मिठे बाते करते है और वोट लेकर चले जाते है. राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा बड़े बड़े दावा करते हे. परंतु जीत के बाद सारे वादे भूल जाते है. गांव में मूलभूत सुविधा मुहैया नही कराया गया है. अगर किसी को इलाज करवाना होता है कि इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र पटमदा ,बोड़ाम प्रखण्ड मुख्यालय जाना पड़ता है. लेकिन पहुंचने के लिए पहाड़ी की रास्ता से होकर गुजरना पड़ता है. उन्होंने बताया कि बोड़ाम प्रखण्ड मुखालय पहुंचने के लिए भी 15 से 20 किलोमीटर चलकर जाना पड़ता है. वहीं अगर किसी की तवियत बिगड़ जाता है तो इलाज के अभाव में उनकी मृत्यु भी हो जाती है. साथ ही गर्ववती महिलाओं के इलाज के लिए झोला छाप डॉक्टरों को बुलाया जाता है. और उन्ही से इलाज कराया जाता है.

    सरकारी योजना से भी है बांछित

    वहीं गांव की एक महिला ने बताया कि उनके राशन कार्ड पर अब तक नाम नहीं चढ़ा, जिस वजह से उन्हें राशन भी नहीं मिलता है. उन्होंने बताया कि आज देश के दूसरे राज्यों के गरीब लोगों के पास आधार कार्ड, वृद्धा पेंशन, उज्जवला गैस कनेक्शन, पीएम आवास, अबुआ आवास जैसे सुविधाए उपलब्ध है. लेकिन ये सारी सुविधाए हमारे लिए वंचित हो चुकी है. गांव के लोग टूटे हुए मकान में रहने को मजबूर, घर में छत तो है परंतु दरवाजा नहीं, इस प्रकार प्रत्येक घर का यही हाल है. आज भी घरेलू महिलाए खाना लकड़ी जलाकर आपने परिवार के लिए भोजन पकाते है. इन परिवार के लोगों को 365 दिन रात में डर के साए में रहना पड़ता है.  गर्मी हो या बरसता सांप,बिच्छू, जहरली चीजों के साथ वन्य जीव जंतु जैसे हाथी,भालू, लकड़बाघा, बंगाल टाईगर आदि जीव जंतु का सामना करना पड़ता है. कई बार ग्रामीण घायल भी होते है, और कई बार तो उनकी जान भी चली जाती है.

    राज्य और केंद्र सरकार की सबसे बड़ी हार

    वहीं एक ग्रामीण ने बताया कि आज देखा जाए तो पुरुलिया जिला के पश्चिम बंगाल के अयोध्या पहाड़ जो कि 1010 वर्ग किलोमीटर में फैले है. इस पहाड़ के ऊपर हजारों परिवारों को मकान, स्कूल, पानी, बिजली, स्वास्थ्य केंद्र सड़क आदि सुविधा उपलब्ध कराया गया. लेकिन उसके अपेक्षा दलमा सेंचुरी में बसे परिवार को आज तक बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मूलभूत सुविधा मुहैया उपलब्ध नहीं कराई गई है. यह एक दुर्भाग्य से कम नहीं है. उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा गांव में दो से चार किलोमीटर पक्की सड़क का निर्माण मुखिया फंड ,विधायक ,संसद ,या फिर  जिला परिषद  स्तर व राज्य स्तर से अबतक नहीं हुआ है. और क्षेत्र की शुद्ध लेने ना तो विधायक आते है और ना ही मंत्री, सांसद. लेकिन जब-जब चुनाव नजदीक पहुंचता है तो उस समय कार्यकर्ता द्वारा भोले भाले ग्रामीणों को अपनी मीठी-मीठी बातों में फंसा कर मतदान कराने के लिए ले जाते है. ग्रामीण मतदान करने के लिए 15 किलोमीटर दूरी तय करके पहाड़ी क्षेत्र होते हुए मतदान केंद्र पहुंच कर वोट देते है. और वोट देकर आपने घर चले आते है. लेकिन मतदान करने के बाद भी आलम यह है कि आदिवासी टूटे-फुटे घर में रहने को मजबूर है. यह राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार की सबसे बड़ी हार है.

    रिपोर्ट. बीरेंद्र मंडल

     


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