बड़ाजामदा: सिर्फ एक डॉक्टर और दो नर्स के बल पर चल रहा खदान मजदूरों के लिए बना सेंट्रल अस्पताल, देखिये बदहाली की तस्वीर

    बड़ाजामदा: सिर्फ एक डॉक्टर और दो नर्स के बल पर चल रहा खदान मजदूरों के लिए बना सेंट्रल अस्पताल, देखिये बदहाली की तस्वीर

    चाईबासा(CHAIBASA): लाखों की आबादी हर महीने सैकड़ो-हजार लोग बीमार. लेकिन उनकी चिकित्सा के लिए महज एक डॉक्टर और दो या तीन नर्स ही हों, तो भला उनका इलाज कैसे होगा. दूसरी ओर 52 बेड किसी कबाड़ में तब्दील दिखे, तो मरीज आखिर ठौर कहां ले. हम बात किसी कहानी की नहीं बल्कि झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के बड़ाजामदा के एक अस्पताल की कर रहे हैं. आम लोग इसे शेष अस्पताल कहते हैं, तो सरकारी कागजों में इसे केंद्रीय चिकित्सालय लिखा जाता है.  27 एकड़ जमीन में फैले इस अस्पताल की शुरुआत  17 सितंबर 1978 को तत्कालीन केंद्रीय राज्य श्रम मंत्री लारंग साई ने की थी. इसका मकसद झारखंड-ओडिशा के विभिन्न खदानों के मजदूरों और उनके परिजनों का निःशुल्क बेहतर इलाज करना था.

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    बेड जर्जर- दवा और इंजेक्शन का भी टोटा

    अस्पताल में न एम्बुलेंस है, ना ही एक्स-रे मशीन. दवा और इंजेक्शन का भी टोटा है. पानी के लिए अस्पताल प्रांगण में स्थित एक मात्र कुआं भी बदहाल.  जिसका पानी पीने लायक नहीं है, लेकिन इसके सिवाय यहां दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है. अब कोई इधर आता भी नहीं. भूल-भटके कोई आ जाए, तो कभी उसे नर्स मिलेगी, तो डॉक्टर नहीं, वहीं कभी डॉक्टर मिलेगा तो नर्स नहीं.

    श्रम कल्याण आयुक्त के पास भी कोई जवाब नहीं

    कुछ महीने पहले जब रांची से श्रम कल्याण आयुक्त अपने दौरे पर अस्पताल पहुंचे थे, तो उनके पास भी इसकी बदहाली के सुधार के लिए कोई जवाब नहीं था, जबकि उनकी ही निगरानी में अस्पताल चलता है. एकमात्र चिकित्सक डॉ. दीपक कुमार बताते हैं कि उन्होंने कई बार उच्च अधिकारी को व्यवस्था सुधारने और सुविधाओं को बहाल करने के लिए पत्र लिखा, लेकिन आज तक कुछ भी नहीं हुआ.

    इस तरह चलता था खर्च

    बताया जाता है कि अस्पताल का खर्च खदानों के डिस्पैच से आने वाली आय से पूरा किया जाता था. खदान प्रबंधन प्रति टन अयस्क पर केंद्र सरकार को निर्धारित रकम देता था. इसी पैसे की बदौलत विशेषज्ञ चिकित्सक, बेहतर एक्स-रे मशीन, पैथोलौजी, एम्बुलेंस, दवा आदि की तमाम सुविधाएं मुहैया होती थीं.  अब जब खदानें बंद होती गईं तो फंड में पैसे आने भी बंद हो गए. लेकिन सवाल है कि जब डीएमएफटी फंड में खदान प्रबंधन प्रति वर्ष हजारों करोड़ रुपये जमा कर रहा है, फिर भी स्थिति में सुधार क्यों नहीं हो रहा है.

     

    रिपोर्ट: संदीप गुप्ता, गुवा(चाईबासा)


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