RIMS जमीन घोटाला: अब नपेंगे बड़गाईं के साहब! हाईकोर्ट की सख्ती से अफसरों में मचा हड़कंप


रांची (RANCHI): झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स की जमीन से जुड़े अतिक्रमण मामले में अब कार्रवाई तेज होती नजर आ रही है. हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद उन अधिकारियों में हड़कंप मच गया है, जिन पर रिम्स की अधिग्रहित जमीन को गलत तरीके से निजी लोगों के नाम कराने का आरोप है. अदालत की नाराजगी ने साफ कर दिया है कि इस मामले में जिम्मेदार अफसर अब बच नहीं पाएंगे.
जांच एजेंसियों की नजर सबसे पहले बड़गाईं अंचल कार्यालय पर टिकी हुई है. सूत्रों के मुताबिक, रिम्स की जमीन से जुड़ी संदिग्ध रजिस्ट्री और म्यूटेशन की प्रक्रिया यहीं से आगे बढ़ाई गई. जिन अंचल अधिकारियों के कार्यकाल में ये म्यूटेशन हुए, उनकी भूमिका की गहराई से जांच की जा रही है. खासतौर पर पूर्व अंचल अधिकारी मनोज कुमार और शिव शंकर पांडे के समय की फाइलें खंगाली जा रही हैं. वहीं, पूर्व सीओ शैलेश कुमार का नाम भी सामने आया है, जो पहले से ही हजारीबाग भूमि घोटाले में जेल में बंद हैं. इससे यह आशंका और मजबूत हो गई है कि यह मामला किसी एक अधिकारी की लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्टाचार का नतीजा हो सकता है.
जांच में यह भी पता चला है कि जब कुछ म्यूटेशन अंचल स्तर पर अटक गए थे, तो उन्हें LRDC कार्यालय के जरिए मंजूरी दिलाने की कोशिश की गई. इसके बाद नगर निगम के अधिकारियों ने भी बिना पूरी जांच-पड़ताल के विवादित जमीनों पर नक्शे पास कर दिए. ऐसे में अब जांच का दायरा सिर्फ अंचल कार्यालय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि LRDC और नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी रडार पर है.
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या कोई एक अंचल अधिकारी अपने दम पर करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन निजी हाथों में सौंप सकता है, या फिर इसके पीछे ऊपर तक फैला कोई संरक्षण तंत्र काम कर रहा था. इस घोटाले की सबसे बड़ी मार आम लोगों पर पड़ी है. लोगों का कहना है कि उन्होंने सरकारी प्रक्रिया के तहत रजिस्ट्री कराई, सरकारी रसीदें कटीं और म्यूटेशन भी हो गया, लेकिन अब अचानक उनके मकानों को अवैध बताया जा रहा है. लोग सवाल कर रहे हैं कि जब पूरा सिस्टम उन्हें सब कुछ वैध होने का भरोसा देता रहा, तो अब कार्रवाई का निशाना सिर्फ वे ही क्यों बन रहे हैं.
हाईकोर्ट ने इस मामले में एसीबी जांच के संकेत देकर साफ कर दिया है कि अब जिम्मेदार अधिकारियों पर भी शिकंजा कसेगा. कोर्ट ने यह भी कहा है कि जिन लोगों को नुकसान हुआ है, उनकी भरपाई सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि दोषी अधिकारियों की संपत्ति कुर्क कर की जानी चाहिए. रांची के विकास के नाम पर सरकारी जमीन के साथ हुए इस खेल में अब सबकी नजर इस पर है कि कार्रवाई सिर्फ छोटे अफसरों तक सीमित रहती है या फिर बड़े पदों पर बैठे लोगों तक भी पहुंचती है.
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