झारखंड में नए आंख के अस्पताल तुरंत नहीं होंगे आयुष्मान योजना में सूचीबद्ध ,जानिए क्या लगी है शर्त 

    झारखंड में नए आंख के अस्पताल तुरंत नहीं होंगे आयुष्मान योजना में सूचीबद्ध ,जानिए क्या लगी है शर्त 

    धनबाद(DHANBAD): झारखंड में आयुष्मान योजना में तरह-तरह के प्रयोग चल रहे है.  गड़बड़ी करने वालों की गर्दन मड़ोरने  के बजाए नियम में ही तरह -तरह के बदलाव किए जा रहे है.  कुछ बदलाव तो सही भी है लेकिन सरकारी अस्पताल से रेफर होने के बाद आंख के मरीजों का इलाज आयुष्मान योजना के तहत किसी निजी अस्पताल में होगा, यह आदेश किसी को पच नहीं रहा है. यह बात अलग है कि अब झारखंड में नए नेत्र अस्पताल (सिंगल स्पेसिफिकेशन ऑफ आई )खुलने के साथ ही आयुष्मान योजना में सूचीबद्ध नहीं हो पाएंगे. इसके लिए उन्हें कम से कम 3 साल का इंतजार करना पड़ेगा. यह निर्णय बिल्कुल सही कहा जा रहा है, क्योंकि बहुत सारे झारखंड में आंख के कई अस्पताल आयुष्मान योजना का लाभ उठाने के लिए ही खोले गए है.  

    बाहर के डॉक्टर के हस्ताक्षर पर उठता है पैसा 

    आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि  बिहार और बंगाल से डॉक्टर धनबाद में आंखों का ऑपरेशन करने आते है. जमीनी सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन कागज तो यही बताते है. एक डॉक्टर के हस्ताक्षर से कई अस्पतालों में मरीजों का ऑपरेशन होता है. इसका खुलासा कम से कम धनबाद में तो हो ही चुका है. नए नियम के अनुसार नए नेत्र अस्पताल 3 साल चलने के बाद ही आयुष्मान योजना में सूचीबद्ध हो पाएंगे.  झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी ने  यह आदेश जारी कर दिया है. पूरे प्रदेश में मोतियाबिंद के ऑपरेशन में क्या-क्या गड़बड़ियां हुई है, इसकी जांच ठोस ढंग से होनी चाहिए.  लोग बताते हैं कि इसकी जांच अगर सही ढंग से हो जाए तो केवल आंख अस्पताल खोलकर आयुष्मान योजना में लाखों- लाख का वारा न्यारा करने वाले कई लोग सलाखों के पीछे होंगे. आयुष्मान योजना के तहत झारखंड में सबसे अधिक विवाद  आंख के इलाज में हो रहा है.  फर्जीवाड़े भी चरम पर किए गए है.  

    अस्पताल चल रहे है लेकिन डॉक्टर है ही नहीं 

    धनबाद में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं कि अस्पताल भी खुल गया है, इलाज भी हो रहा है, ऑपरेशन भी हो रहा है लेकिन अस्पताल के पास अपना कोई डॉक्टर नहीं है. जब डॉक्टर की खोजबीन होती है तो कहा जाता है कि बंगाल अथवा बिहार से डॉक्टर आते है.  यह बात सही  है कि केवल राशि हड़पने के लिए अस्पताल खोलकर चलाने वालों पर शिकंजा तो कसना ही चाहिए लेकिन इसके साथ ही जो अस्पताल सही में अस्पताल चला रहे हैं और मरीजों का इलाज कर रहे हैं, उनकी भी बदनामी ऐसा करने वाले कर रहे है. उनके संगठन को भी ऐसे फर्जीवाड़ा करने वालो के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए. अस्पतालों पर जरूर शिकंजा कसा जाए , गड़बड़ी करने वालों की गर्दन  मरोड़ा जाये लेकिन मरीजों को अधिक परेशानी नहीं हो, इसका ख्याल रखना होगा. नए नियम के अनुसार नेत्र अस्पताल को आयुष्मान भारत योजना में सूचीबद्ध क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट रजिस्ट्रेशन के आधार पर अब किया जाएगा. वही अस्पताल सूचीबद्ध हो पाएंगे जो कम से कम 3 वर्षों से अस्पताल चला रहे होंगे. 

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 


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