नगर निकाय चुनाव को लेकर गरमाई झारखंड की सियायत, दलीय बनाम गैर-दलीय बहस ने बढ़ाया सस्पेंस, जानिए BJP का स्टैंड


टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : झारखंड में नगर निकाय चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज है. दिलचस्प बात यह है कि फिलहाल बहस स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर नहीं, बल्कि चुनाव किस तरीके से कराए जाएं इसपर टिकी हुई है. भाजपा की ओर से नगर निकाय चुनाव दलीय आधार पर कराने की मांग ने राज्य की राजनीति को साफ तौर पर दो खेमों में बांट दिया है. एक तरफ भाजपा इस मांग को लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़ रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार और प्रशासन गैर-दलीय व्यवस्था के तहत चुनाव कराने की तैयारी में जुटे हैं.
दलीय चुनाव से मतदाता को मिलेगा साफ संदेश: भाजपा
भाजपा का कहना है कि अगर नगर निकाय चुनाव दलीय आधार पर होंगे, तो मतदाताओं को यह स्पष्ट रूप से पता रहेगा कि कौन सा उम्मीदवार किस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है. पार्टी का दावा है कि इससे शहरी विकास को एक तय दिशा मिलेगी और नीतियों में स्पष्टता आएगी. भाजपा का यह भी तर्क है कि चुने गए जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय हो सकेगी. दलीय चुनाव होने पर विकास कार्यों का श्रेय और नाकामियों की जिम्मेदारी सीधे संबंधित पार्टी पर तय की जा सकेगी, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत होगी. पार्टी यह भी उदाहरण दे रही है कि देश के कई राज्यों में नगर निकाय चुनाव दलीय आधार पर होते हैं और वहां शहरी प्रशासन ज्यादा संगठित और जवाबदेह दिखाई देता है.
भाजपा के पास कोई मुद्दा नहीं: कांग्रेस
भाजपा की इस मांग पर कांग्रेस ने तीखा हमला बोला है. कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने कहा कि भाजपा के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वह सिर्फ विरोध की राजनीति कर रही है. उन्होंने कहा कि एक साल पहले ही यह तय हो चुका था कि नगर निकाय चुनाव गैर-दलीय आधार पर होंगे. उस वक्त भाजपा नेताओं ने कोई आपत्ति नहीं जताई. अब अचानक मुद्दा उठाना उनकी नीयत पर सवाल खड़े करता है. राजेश ठाकुर ने यह भी कहा कि भाजपा नेताओं को आम लोगों की समस्याओं से कोई मतलब नहीं है, उनका मकसद सिर्फ काम को उलझाना है.
चुनाव गैर-दलीय, लेकिन सियासत पूरी तरह दलीय
हालांकि आधिकारिक तौर पर नगर निकाय चुनाव गैर-दलीय आधार पर ही कराए जाएंगे, लेकिन इसके बावजूद सभी बड़े राजनीतिक दल अंदरखाने अपनी-अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं. उम्मीदवारों को पार्टी लाइन पर काम करने, प्रचार की दिशा तय करने और संगठनात्मक समर्थन देने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. इस पूरे समीकरण में राजनीतिक दलों की भूमिका अहम रहने वाली है. वहीं, सामाजिक संगठन और शहरी नागरिक समूह भी चुनावी माहौल में सक्रिय होते नजर आ रहे हैं. कुल मिलाकर, चुनाव भले ही गैर-दलीय हों, लेकिन सियासत पूरी तरह दलीय रंग में रंगती दिख रही है.
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