महिला पर्यवेक्षिकाओं का स्थानांतरण आदेश बना मजाक, प्रशासनिक अनदेखी या घोर अनुशासनहीनता?

    महिला पर्यवेक्षिकाओं का स्थानांतरण आदेश बना मजाक, प्रशासनिक अनदेखी या घोर अनुशासनहीनता?

    पलामू(PALAMU): राज्य के महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग के अंतर्गत एक माह पूर्व किये गए महिला पर्यवेक्षिकाओं के स्थानांतरण में अव्यवस्था और अनुशासनहीनता का एक अनोखा उदाहरण सामने आया है. गत 19 जुलाई को समाज कल्याण निदेशालय के निदेशक शशि प्रकाश झा द्वारा राज्य की 365 महिला पर्यवेक्षिकाओं का राज्य स्तर पर ट्रांसफर किया गया. यह कदम प्रशासनिक सुधार और कार्यकुशलता बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया था, लेकिन इसका क्रियान्वयन विवाद और अव्यवस्था का शिकार हो गया है. स्थिति की गंभीरता इस हद तक बढ़ गई कि कई पर्यवेक्षिकाओं के ट्रांसफर आदेश उन कर्मचारियों को भी जारी कर दिए गए जो या तो मृत थीं या जिन्होंने सेवा से त्याग पत्र दे दिया था. इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि कई महिला पर्यवेक्षिकाओं ने निदेशक के आदेश की अवहेलना करते हुए एक महीने बाद भी अपने पूर्व कार्यस्थल पर ही डटे रहने का निर्णय लिया. इससे यह सवाल उठता है कि क्या राज्य में किसी भी विभाग के कर्मचारी उच्चाधिकारियों के आदेशों को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र हैं?

     इस स्थिति से असंतुष्ट कई महिला पर्यवेक्षिकाओं ने अपनी कठिनाइयों का हवाला देते हुए निदेशक कार्यालय में अभ्यावेदन दायर किया. इस प्रकार, राज्य के प्रशासनिक ढांचे में पहली बार ऐसा हुआ कि ट्रांसफर लेटर जारी होने के बाद, 50 से अधिक पर्यवेक्षिकाओं के अभ्यावेदन को स्वीकार कर, उनके स्थानांतरण आदेशों में फेरबदल किया गया और उन्हें उनकी पसंद के परियोजनाओं में पुनः स्थानांतरित कर दिया गया. यह निर्णय 29 जुलाई को हुई स्थापना समिति की बैठक में लिया गया, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि निदेशालय की कमजोरियों का लाभ उठाकर महिला पर्यवेक्षिकाओं ने अपने पूर्व परियोजनाओं में बने रहने का अवसर प्राप्त कर लिया. यह स्थिति तब और भी अधिक गंभीर हो गई जब यह पाया गया कि पुनः स्थानांतरित की गई पर्यवेक्षिकाओं ने भी 25 दिनों के बाद अभी तक अपने नए कार्यस्थलों पर योगदान नहीं दिया है. यह बात स्पष्ट करती है कि महिला पर्यवेक्षिकाओं ने न केवल निदेशक के आदेश को ठेंगा दिखाया है, बल्कि सीडीपीओ और जिला अधिकारियों ने भी इस मामले में उदासीनता दिखाई है.

     प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते सवालों के बीच यह जानना जरूरी है कि क्या यह मामला सरकारी कर्मचारियों द्वारा मनमानी, उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना, स्वेच्छाचारिता, लापरवाही और अनुशासनहीनता की श्रेणी में नहीं आता? अगर ऐसा है, तो उच्चाधिकारियों द्वारा अब तक कोई प्रशासनिक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? और अगर नहीं, तो महिला पर्यवेक्षिकाओं की यह सफलता क्या दर्शाती है? इस पूरे प्रकरण में जिला उपायुक्त और जिला समाज कल्याण पदाधिकारी की चुप्पी भी प्रश्नों के घेरे में है. राज्य के प्रशासनिक ढांचे में इस तरह की स्थिति ने यह साबित कर दिया है कि अगर समय रहते उच्चाधिकारियों द्वारा ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में अन्य कर्मचारी भी इसी प्रकार से आदेशों की अवहेलना करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं. इससे न केवल प्रशासनिक अनुशासन पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि कार्यकुशलता और सुशासन की अवधारणा पर भी गंभीर चोट पहुंची है.

    क्या कहना है निदेशक का

    समाज कल्याण झारखंड के निदेशक शशि प्रकाश झा से दूरभाष पर इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि एक महीना बाद भी स्थानांतरित परियोजना में योगदान नहीं करना गंभीर मामला है. इसको लेकर समीक्षा बैठक जल्द ही की जायेगी. उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री मईयां सम्मान योजना को लेकर भी जिले से पर्यवेक्षिकाओ को बर्मित नहीं किया गया होगा. इस महीना के अंत तक उन्हें बिरमित कर दिया जाएगा.


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