23 साल बाद भी नहीं हुई दुमका उच्च न्यायालय के खंडपीठ की स्थापना, 2024 चुनाव के आते ही खुली नेताओं की नींद, पढ़ें कैसे राजनीति की भेंट चढ़ता आ रहा है मुद्दा  

    23 साल बाद भी नहीं हुई दुमका उच्च न्यायालय के खंडपीठ की स्थापना, 2024 चुनाव के आते ही खुली नेताओं की नींद, पढ़ें कैसे राजनीति की भेंट चढ़ता आ रहा है मुद्दा   

    दुमका(DUMKA):हर समस्या का समाधान होता है, बशर्ते समाधान करने वालों के अंदर दृढ़ इक्षाशक्ति होनी चाहिय,लेकिन कुछ समस्याएं ऐसी होती है जो चुनावी मुद्दा बन कर रह जाती है. इन समस्यों के समाधान की दिशा में सार्थक पहल नहीं हो पाता. ऐसी ही एक समस्या है झारखंड की उप राजधानी दुमका में उच्च न्यायालय के खंडपीठ की स्थापना. चुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का, हर चुनाव में यह मुद्दा बनता है, लेकिन चुनाव के बाद इसको भूल जाया जाता है.

    दुमका में हाईकोर्ट के खंडपीठ स्थापित करने की मांग जोर पकड़ने लगा है

    वर्ष 2024 चुनावी वर्ष है, ऐसी स्थिति में एक बार फिर से दुमका में हाईकोर्ट के खंडपीठ स्थापित करने की मांग जोर पकड़ने लगा है.इस मांग को जोर पकड़ने का तात्कालिक कारण बना देवघर विधायक नारायण दास के सवाल पर संसदीय कार्य मंत्री आलमगीर आलम का जबाब.विधायक नारायण दास ने दुमका में जमीन उपलब्ध नहीं होने पर इसे अन्य जिलों में स्थापित करने की मांग की थी. वहीं इस सवाल जबाब पर दुमका जिला अधिवक्ता संघ द्वारा गहरा रोष व्यक्त करते हुए कोर्ट परिसर में एक दिवसीय धरना दिया गया. इसके बाद राज्यपाल के नाम प्रेषित एक स्मार पत्र जिला प्रशासन को सौंपा गया.

    विधायक नलिन सोरेन द्वारा  2014 में विधानसभा में ध्यान आकृष्ट कराया गया था

     संघ की ओर से आयोजित धरना कार्यक्रम में झामुमो के वरिष्ठ नेता सह पूर्व उपमुख्यमंत्री और वर्तमान में महेशपुर के विधायक प्रो स्टीफन मरांडी भी शामिल हुए. उपराजधानी दुमका में हाईकोर्ट का खंडपीठ स्थापित करने से संबंधित अधिवक्ता संघ की मांग का उन्होंने समर्थन किया.प्रो. स्टीफन मरांडी ने कहा कि बिहार पुनर्गठन विधेयक 2000 की धारा 25(3) में झारखंड उच्च न्यायालय का खंडपीठ स्थापित किये जाने का प्रावधान किया गया है. इसी को लेकर उनके उप मुख्यमंत्रित्व काल में दुमका में खंडपीठ स्थापित करने के मद्देनजर बंदरजोरी मौजा में 13.84 एकड़ जमीन चिह्नित कर अधिग्रहण की कार्रवाई करने के साथ मुआवजा भी दिया जा चुका है. चिन्हित वन भूमि के एवज में दिये जाने वाले भूमि को भी चिन्हित कर लिया गया है. इसको लेकर शिकारीपाड़ा के विधायक नलिन सोरेन द्वारा  2014 में विधानसभा में ध्यान आकृष्ट कराया गया था.

    ऐसे मुद्दे पर राजनीति दुखद और दुर्भाग्य पूर्ण है

    वहीं राज्य सरकार की ओर से विधानसभा के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव में उत्तर भी दिये गये थे. सरकार की ओर से 5 अगस्त 2014 को दिये गये उत्तर में बताया गया है कि उपायुक्त दुमका के पत्रांक 32, दिनांक 8 जनवरी 2012 के बारेमें यह जानकारी देते हुए भवन निर्माण विभाग झारखंड सरकार को अग्रेतर कार्रवाई के लिए सूचित भी किया जा चुका है, जिसका उल्लेख किया गया था. वहीं राज्य सरकार की ओर से सदन को बताया गया था कि भारत के संविधान में दिये गये प्रावधान के अनुसार झारखंड उच्च न्यायालय के बैंच की स्थापना से संबंधित निर्णय लेने के लिए केन्द्र सरकार ही सक्षम है.यह संघ सूची का विषय है. उन्होंने कहा कि इसके बाद 2015 में भी झारखंड विधानसभा से सर्वसम्मति से उच्च न्यायालय का बैंच दुमका में स्थापित करने से संबंधित प्रस्ताव पारित किया जा चुका है. इसके बावजूद दुमका में जमीन उपलब्ध नहीं होने पर हाईकोर्ट का बैंच अन्यत्र स्थापित करने को लेकर सवाल उठा कर दुमका समेत संताल परगना के लोगों को दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है.ऐसे मुद्दे पर राजनीति दुखद और दुर्भाग्य पूर्ण है.

    उपराजधानी का दर्जा होने के कारण शुरू से ही यहां खंडपीठ स्थापित करने की मांग हो रही है

    वहीं अधिवक्ताओं को विश्वास दिलाया कि दुमका में हाईकोर्ट का बैंच स्थापित करने के संबंध में वे शीघ्र ही राज्य के मुख्यमंत्री से मिलकर यहां की जनभावना से उन्हें अवगत करायेंगे. उन्होंने कहा कि दुमका में हाईकोर्ट का बैंच स्थापित करने के मसले पर उनकी पार्टी कृत संकल्पित है.इसके लिए वे और उनकी पार्टी जिला अधिवक्ता संघ के साथ है.अलग झारखंड राज्य गठन के साथ ही उच्च न्यायालय का खंडपीठ स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया. दुमका को उपराजधानी का दर्जा होने के कारण शुरू से ही यहां खंडपीठ स्थापित करने की मांग हो रही है. अलग राज्य बने 23 वर्ष बीत गए. खंडपीठ स्थापित करने की दिशा में कदम भी उठाए गए. जरूरत है जनहित में दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर यहां उच्च न्यायालय का खंडपीठ स्थापित करने की दिशा में सार्थक पहल करने की ना कि चुनावी मुद्दा बनाकर छोड़ देने की.

    रिपोर्ट-पंचम झा


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