धनबाद की झरिया जिसको "चुन लेती है, उसकी किस्मत बदल देती" है, फिलहाल माले की क्यों गड़ी है नजर, पढ़िए डिटेल्स में !

    धनबाद की झरिया जिसको "चुन लेती है, उसकी किस्मत बदल देती" है, फिलहाल माले की क्यों गड़ी है नजर, पढ़िए डिटेल्स में !

    धनबाद(DHANBAD) : झरिया विधानसभा सीट पर माले की नजर गड़ गई है. अभी चुनाव में बहुत देरी है, लेकिन अभी से ही जमीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है. झरिया विधानसभा क्षेत्र के ही  विवाद पर पूर्व सांसद एके राय की "कुटिया" में हंगामा और तोड़फोड़ हुई थी. बावजूद माले  झरिया पर नजर गड़ाए हुए है. 2024 के विधानसभा चुनाव में धनबाद के दो सीटों पर माले  को सफलता मिली है.  इस वजह से उत्साह भी बढ़ाना स्वाभाविक है.  माले  के कार्यकर्ता और नेता झरिया क्षेत्र में लगातार बैठक कर रहे है. कमेटियों का गठन हो रहा है, कार्यकर्ता सम्मेलन किए जा रहे है. बेशक झरिया मजदूरों का क्षेत्र है, झरिया कई मामलों में भी महत्वपूर्ण है.  वैसे तो कहा यही जाता है कि कोयलांचल में किसी भी दल की राजनीति कोयले की चमक से ही चमकती है. झरिया सीट की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है. इतिहास भी यही बताता है कि झरिया जिसको चुन लिया, उसकी किस्मत बदल जाती है. 

    धनबाद की झरिया देश की अनूठी कोयला बेल्ट है

    धनबाद की झरिया देश की अनूठी कोयला बेल्ट है. दुनिया भर से अच्छी गुणवत्ता का कोयला झरिया में ही मिलता है.  विशेषता यह भी है कि यह कोयला जमीन के बहुत   करीब होता है. 1884 से झरिया इलाके में कोयला का खनन किया जा रहा है. भूमिगत आग का पता भी 1919 में इसी इलाके से चला. कोयलांचल की अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र पहले झरिया थी. आज भी कमोवेश है. विशेषता यह है कि कोयला जमीन के नजदीक उपलब्ध हो जाता. फिलहाल जमीन के नीचे आग लगी हुई है, तो जमीन के ऊपर "राजनीतिक आग" भी जल रही है, यह इलाका दबंगई  के लिए भी जाना जाता है. 1977 के बाद से अगर बात की जाए तो  सूर्यदेव सिंह झरिया विधानसभा से चार बार विधायक रहे.  उनके निधन के बाद दो बार उनकी पत्नी और एक बार उनका बेटा विधायक रहे. उनके भाई बच्चा सिंह भी विधायक रहे.  

    फिलहाल झरिया विधानसभा से सूर्यदेव सिंह की बहू विधायक है 
     
    फिलहाल सूर्यदेव सिंह  की बहू झरिया विधानसभा से विधायक है. 2019 के विधानसभा चुनाव में सूर्यदेव सिंह के भाई की बहू पूर्णिमा नीरज सिंह चुनाव जीती थी. 2019 के विधानसभा चुनाव में पूर्णिमा नीरज सिंह को 79,786 वोट मिले थे. भाजपा से चुनाव लड़ रही रागिनी सिंह को 67,732 वोट से ही संतोष करना पड़ा था. वैसे, झरिया की भौगोलिक बनावट भी विचित्र है. राजा के शहर  झरिया की बूढ़ी  हड्डियां आज आठ-आठ आंसू बहा रही है. यह कहना गलत नहीं होगा कि झरिया की राजनीति कर कई लोग राज्य से लेकर केंद्र तक मंत्री बन गए. मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन इसका लाभ झरिया की बूढ़ी हड्डियों को नहीं मिला. आज झरिया प्रदूषण से कराह रही है. झरिया की जनता बूंद बूंद पानी के लिए तरस रही है. झरिया के रैयत पुनर्वास के लिए प्रयास कर रहे है. झरिया में टकराव की राजनीति भी खूब चलती है. यह राजनीति आज से नहीं, बल्कि बहुत पहले से चलती आ रही है. 

    एक समय तो झरिया की हैसियत वर्तमान से बहुत अधिक थी 
     
    एक समय तो झरिया की हैसियत कुछ ऐसी थी कि झरिया से ही लोग धनबाद को जानते थे. लेकिन आज यह गौरवशाली झरिया सुविधाओं की मांग कर रही है. कहा तो यह भी जाता है कि झरिया में रहने वाले लोग अपनी कुल आयु के 10 वर्ष कम जीते है. क्योंकि प्रदूषण इतना अधिक है कि लोगों की आयु कम हो जाती है. फिलहाल आउटसोर्सिंग के जरिए भारत कोकिंग कोल लिमिटेड कोयला का उत्पादन कर रहा है. नतीजा है कि वायुमंडल में धूल कण की वजह से प्रदूषण की मात्रा काफी अधिक रहती है. ऐसी बात नहीं है कि समस्याओं से घिरी झारिया आवाज नहीं उठाती है. आवाज उठाती है, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती. यह भी होता है कि राजनीतिक दल के लोगों की आवाज में बुलंदी नहीं होती. कुछ सामाजिक संगठन आवाज उठाते हैं, लेकिन वह नक्करखाने  में तूती की आवाज साबित होती है.

    रिपोर्ट-धनबाद ब्यूरो   


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